Sunday, May 24, 2020

प्रकरण क्रमांक:- (२९) "मर्यादित परिवार"

                  "मानवधर्म परिचय"


"मानवधर्म परिचय पुस्तक" ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती



             "मानवधर्म परिचय पुस्तक"

                  प्रकरण क्रमांक (२९)

                    "मर्यादित परिवार"


प्रकरण क्रमांक:- (२९) "मर्यादित परिवार"


        महानत्यागी बाबा जुमदेवजीने मानव धर्म की शिक्षा में जो चार तत्व, तीन शब्द और पाँच नियम दिये है, उनमें से नियम पांच में उस समय की परिस्थिती अनुसार "मानव मंदिर सजाने के लिये फन्ड अनुदान जमा करना" यह नियम दिया था। तदनुसार बाबाने सेवकों का मानव मंदिर, सहकारी बँक, ग्राहक भांडार इसके स्वरुप में सुसज्जित करने के बाद भी सेवकों को जीवनयापन चलाने के लिये कठिनाई आती है। यह ध्यान में आने पर उसके कारणों का संशोधन कर उसपर इलाज (निदान) निकाला।

       वर्तमान में देश की अथवा संपूर्ण दुनिया की परिस्थिती को देखते हुए मानवों की निर्मित समस्याएँ कोई भी सरकार संपूर्णतः छुडा नही सकती। अथवा कोई भी सरकार अपने देश की उन्नती नही कर सकती। बढती हुई महंगाई, खाद्यान्यों की कमी, उद्योग, व्यवसाय में गिरावट इसे यदि कोई जिम्मेदार है तो वह बढती हुई जनसंख्या है। जब तक इस बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण नही लगेगा तब तक वर्तमान समय में कोई भी देश अपनी प्रगती नही कर सकता। इसलिए हर एक देश की सरकारने इस विषय में कई संशोधन पर "परिवार कल्याण" नामक योजना प्रारंभ की है। उसमें भारत यह देश दूसरे
क्रमांक पर है लेकीन यह योजना भारत में सरकार के व्दारा सफल नही हुई। भारत सरकार अभी भी मर्यादित परिवार के लिये मानव जागृती कर विभिन्न प्रकार की योजनाएँ चला रही है। लेकीन सरकार अभी-भी जनसंख्या पर नियंत्रण नही कर सकी।

         महानत्यागी बाबा जुमदेवजींने भगवान बाबा हनुमानजी का वार्षिक कार्यक्रम तथा एक भगवंत का सैतीसवां प्रगट दिन उत्सव दि. १७/८/१९८४ को मनाते समय सेवकों को निर्मित समस्याओं का निराकरण कराने के लिये निम्नानुसार मार्गदर्शन किया।

         उन्होंने अपने मार्गदर्शन में कहा की जीवन में चलने के लिए, गृहस्थी उच्च स्तर पर लाने के लिये, मानवी जीवन के अनेक उद्देश सफल बनाने के लिये बाबाने जो पांच नियम दिये है। उनमें से पाँचवा नियम मानव मंदिर सजाने के लिये "फंड अनुदान जमा करना" की जगह "अपना परिवार मर्यादित रखना" यह नियम आज से लागू करे। क्योंकी फंड अनुदान बहुत हो चुका और उस फंड का सदपयोग हमने अच्छे कार्य के लिये किया है। और इन सभी बातों का लाभ सेवकों को मिल रहा है। लेकीन सेवक उनके बच्चो का सही ढंग से परिपालन कर सकें तथा उन्हें अच्छी शिक्षा दे सके। इसके लिये हर एक की अपना सिमित परिवार चाहिये। इस लिये निम्नानुसार नियम का पालन करे। ऐसा सेवकों को आदेश दिया।

१) इस मार्ग में जो सेवक है अथवा होंगे, उनके परिवार में जिनकी शादी हुई है अथवा आगे होगी, उन्होने शादी के बाद केवल दो बच्चे (संतान) होने दे।
२) डॉक्टरी सलाह लेकर स्त्रीयों ने गर्भ प्रतिबंधक उपाय करना चाहिए।
३) प्रत्येक परिवार में लड़के (पुत्र) के विवाह की आयुसीमा २५ वर्ष की हो। २५ वर्ष से पहले किसी भी लडके का विवाह ना करे।

         महानत्यागी बाबा जुमदेवजीने आगे कहा की, आज ऐसा देखने में आता है की शादी होने पर ४-५ साल में ही ३-४ बच्चे पैदा होते है।उस कारण माता-पिता को उनका परिपालन करने में तारे नजर आते है और उन्हें बहुत कष्ट होता है। उसी प्रकार माँ की प्रकृती पर भी परिणाम होता है। उपरोक्त नियमों का पालन करने से स्वास्थ ठिक और खर्च में बचत होकर जीवनमान ऊँचा होगा इसलिये सभी आगे "मर्यादित परिवार" यह नियम पालन करें ऐसा आदेश दिया और उस दिन से अर्थात १७ अगस्त १९८४ से सभी सेवकों ने वह नियम अमल में लाया।

        इस तरह जो काम सरकार एकाएक कर नही सकी, वह कार्य इस मार्ग के सेवक बाबांके आदेशानुसार सेवकों को मार्गदर्शन करके राष्ट्रहित का कार्य कर रहे है।

नमस्कार..!

लिखने में कुछ गलती हुई हो तो में  "भगवान बाबा हनुमानजी"और "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" से क्षमा मांगता हूं।

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Saturday, May 23, 2020

प्रकरण क्रमांक:- (२८) "महानत्यागी"

               "मानवधर्म परिचय"


"मानवधर्म परिचय पुस्तक" ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती



              "मानवधर्म परिचय पुस्तक"

                  प्रकरण क्रमांक (२८)

                      "महानत्यागी"


प्रकरण क्रमांक:- (२८) "महानत्यागी"


           समर्थ बाबा जुमदेवजीने १९४६ साल में बाबा हनुमानजी की प्राप्ति करने के पश्चात वे मानव के दुःख दुर करने लगे। लेकीन उस कृपा से मानव के दुःख पूर्णत: नष्ट नहीं हुए इसलिये उन्होने ऐसी शक्ती का संशोधन करना प्रारंभ किया कि जो मानव के सभी प्रकार के दुःख हरण कर सके। अंत में उन्होने सन् १९४८ में एक भगवंत की प्राप्ती की। तब से परमेश्वर के प्रती मनुष्यों को जगाने का कार्य निष्काम भावना से वे निरंतर कर रहे है। इसके लिये बाबा मानव को रोज मार्गदर्शन करते है।

         मानवको उनके शारिरीक एवं मानसिक दुःखो से मुक्त करने के बाद उनकी आर्थिक और सामाजिक कठिनाईयों का निवारण करने के लिये बाबा आध्यात्मिक विषयों के साथ-साथ सामाजिक क्रांती की ओर बढे। उसके लिये उन्होने अपने सेवकों की आवश्यकताएँ पूर्ण होना चाहिये इसलिये परमपूज्य "परमात्मा एक सेवक मंडळ'" की स्थापना की, और उस माध्यम के व्दारा परमात्मा एक नागरिक सहकारी बँक, गोलीबार चौक, नागपूर यहाँ स्थापित की। जागनाथ बुधवारी, नागपूर यहाँ "परमात्मा एक सेवक ग्राहक भंडार" खोला। सालईमेटा और धोप इन गाँवों में वहाँ के सेवकों को कृषी के
साथ-साथ जोड धंधा मिलना चाहिए इसलिये दुध उत्पादक संस्था की स्थापना की।

         यह सब कार्य करते समय आध्यात्मिक विषय पर अधिक जोर देकर उन्होने सन् १९४७ से १९८४ अर्थात् करीब ३७ वर्षोतक लगातार निष्काम भावना से मानव जागृती के कार्य किये। अभी भी यह कार्य चालु है। इसके लिये उन्होने गाँव-गाँव, बस्ती-बस्ती, गर्मी (धूपकाल), बारीश(बरसात) अथवा ठंड (शीतकाल) के दिनों की परवाह न करते हुए पैदल, खाचर(छकडा), बैलगाडी, बस इत्यादी साधनो से यात्रा की। इसके लिये आनेवाला खर्च वे स्वंय वहन करते थे। गाँव-गाँव में जो कुछ भी मिलता वह खाते-पीते रहते। लेकीन मैंने भगवंत प्राप्ती की है, इसलिये लोगों ने मुफ्त में भोजन कराये ऐसा मोह कभी भी होने नही दिया। वे कभी भी गुरुपुजा नही लेते। आत्मा यही परमात्मा है और वह हर एक में है, यह वे समझते है। इसलिये किसी को भी स्वयं के पांव छुने (पडने) नही देते। किसी का भी व्यक्तिगत हार स्वीकार नही करते। परमेश्वरी कार्य करते समय वे स्नान करने करने की अथवा भोजन करने की भी परवाह नही करते।

       बाबांने उपरोक्त संस्थाएँ स्थापना कर सेवकों को उनकी गृहस्थी उच्च स्तर पर लाने के लिये इस संस्थाओं से लाभ दिलाया है। यह संस्थाएँ बाबांने अपने मार्गदर्शन व्दारा तैयार की है। उन्होने खुद अंगमेहनत की है. खुद का शरीर झिजाया है। यह योजनाएँ साकार करने के लिये स्वयं के खुन का पानी किया है (बेहिसाब मेहनत की) और यह संस्थाएँ निर्माण होकर नाम रुप आने पर स्वंय के परिश्रम का फल समझकर भी उन्होने उसके बदले में कुछ भी नही लिया। इन संस्थाओं सें होनेवाले लाभ का कभी-भी स्वंय के लिये उपयोग नही किया कदापि चाय तक भी उन्होने इस संस्थाओं की ओर से नही ली। बैंक की और मंडल की वास्तू तैयार करते समय स्वयं छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देकर वह पूर्ण करने के लिये अति परिश्रम किया। इस पर से उन्होने किये हुए त्याग की कल्पना कर सकते है।

         इतना ही नही "आपना सारखे करिती तात्काळ नाही काळवेळ तया लागी" इस कथनानुसार समर्थ बाबा जुमदेवजींने अपने सभी सेवकों को (स्वावलंबी) आत्मनिर्भर जीवन जीने के लिये सिखाया है। उनके आचरण(व्यवहार) में स्वयं जैसा त्याग निर्माण किया है। बाबांने दिये हुए तत्व, शब्द और नियमों के व्यवहार से, सेवकों के जीवन में त्याग ही निर्माण हुआ है। और इसलिये मंडल व्दारा अस्तित्व में आयी सभी संस्थाएँ प्रगती पथ पर है उन्होने अपने जीवन में निरंतर त्याग करने के कारण उनपर परमेश्वर की कृपा कायम है।

        परमेश्वरी कार्य के लिये बाबा निरंतर त्याग करते आये है बाबां के यह उपरोक्त सभी तरह के कार्यों को ध्यान में रखकर परमपूज्य परमात्मा एक सेवक मंडळ ने दि. ५/८/१९८४ को कार्यकर्ताओं की बैठक में "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" ऐसा संबोधन करना चाहिए यह निश्चित किया। और तद्नुसार समस्त सेवकों की ओर से मंडल के कार्यकारिणीने बाबा को विनम्र बिनती करने पर सेवकों की बिनती को सम्मान देकर उपरोक्त उपाधि स्विकारने हेतु बाबांने अनुमती दी। तद्नुसार दि. १६ अगस्त १९८४ के दिन सम्पन्न वार्षिक प्रगट दिन के सुअवसर पर बाबां को "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" यह उपाधि समस्त सेवकोंकी ओर से प्रदान की गई। और बाबाने यह सहर्ष स्वीकार की। उस दिन से बाबा सद्गुरु समर्थ इस नाम की जगह में "महानत्यागी" बने ।

नमस्कार..!

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प्रकरण क्रमांक:- (२७) "ज्ञान पररस् मररस् योगी"

              "मानवधर्म परिचय"

"मानवधर्म परिचय पुस्तक" ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती



            "मानवधर्म परिचय पुस्तक"

                प्रकरण क्रमांक (२७)

            "ज्ञान पररस् मररस् योगी"


प्रकरण क्रमांक:- (२७) "ज्ञान पररस् मररस् योगी"


           सन १९८३ की घटना है। महानत्यागी बाबा जुरमदेवजी उस दिन अपने निवास स्थान पर रात को अपने आसनपर सोए थे। नींद में उन्हें साक्षात्कार दिखा। उस में उन्हें कोई भी व्यक्ती अथवा कोई भी वस्तु नही दिखायी दी। उन्हें मात्र बडे-बडे अक्षर लिखे हुए दिखे। उनके मुख से निरंतर वही-वही शब्द बाहर निकल रहे थे। वे शब्द थे, "ज्ञान पररस मररस योगी"। करीब करीब आधा घंटे तक वे ये शब्द पढ़ रहे थे उसके बाद उनकी नींद खुली। उसके बाद भी उनके मुख से वही शब्द बाहर निकल रहे थे इसलिये बाबाने डायरी में उसी समय उन शब्दों को लिख लिया। ये शब्द यद्यपी उन्हें प्रत्यक्ष में दिखे फिर भी वे शब्द परमेश्वर ने ही उनके मुखकमल से बाहर निकाले थे।

        उस पर बाबांने गहन विचार किया और बाद में वे सबको बताने लगे की, जिस तरह परिस नाम की वस्तु का, लोहे को स्पर्श होने से वह लोहा सोना बनता है। उसी प्रकार ज्ञान यह परिस के समान है। इस ज्ञान को जो स्पर्श करेगा वह सोना बन जाएगा। अर्थात वह महानज्ञानी बनता है। लेकीन मानवी जीवन में दैशीशक्ती के लिये मन की एकाग्रता, एक चित्त, एक लक्ष, एक भगवान इसकी अति आवश्यकता है। यही दैवी शक्ती का उगमस्थान है। परमेश्वर को सामने रखकर बाबांने दिये हुए, "मरे या जिये भगवत् नामपर" इस तत्वानुसार परमेश्वर के नाम पर मरने पर भगवंत भक्त के पीछे खडा होता है, और परिस जैसा रस तैयार होकर वह ज्ञानी बनता है। यदि वह मरा नहीं तो रस तैयार नहीं होगा। इसलिये मनुष्य मरने पर ही उसका रस तैसार होता है और रस बनने पर वह व्यक्ती योगी समान बनता है। यह इस मार्ग के सेवकों को प्रत्यक्ष अनुभव है। परमेश्वर के नामपर मरनेवाला व्यक्ती बाबां के दिये हये तत्व, शब्द, नियम से चले तो वह योग बनता है अन्यथा उसे कितना भी किताबी ज्ञान होगा फिर भी वह योगी नहीं बन सकता। उसे परमेश्वर का साथ होना जरुरी है। कर्तव्य से आत्मानुभव आता है। आत्मप्रचिती होती है. आत्मज्ञान बढ़ता है, तभी वह ज्ञानी पुरुष होकर योगी बनता है यह सिध्द होता है।

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Friday, May 22, 2020

प्रकरण क्रमांक:- (२६) "असाध्य रोग"

                   "मानवधर्म परिचय"


"मानवधर्म परिचय पुस्तक" ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती



             "मानवधर्म परिचय पुस्तक"

                 प्रकरण क्रमांक (२६)

                    "असाध्य रोग"


प्रकरण क्रमांक:- (२६) "असाध्य रोग"


         मानव धर्म को मानव ने अपनाया तो उसके असाध्य रोगभी साध्य होते है। अर्थात असाध्य रोगों से पिडीत व्यक्ती भी ठीक होता है। उदाहरणार्थ हृदयविकार, कोड, महारोग, कॅन्सर, टी.बी., मुळव्याध(बवासीर), कावीळ(पिलीसा), मधुमेह इत्यादी इसके अनेक उदाहरण के रूप में इस मार्ग के सेवकों ने अनुभव बताए है। इन असाध्य रोगों में वंशपरंपरागत एवं संसर्गजन्य ऐसे कोई रोग है। इस मार्ग में सभी प्रकार के रोग नष्ट होते है।

         जब उपरोक्त कोई भी रोग उदा. टी.बी., महारोग (कुष्ठ), कोड, मधुमेह (इायबिटिज), मुळव्याध(बवासीर), हृदयविकार मानव को होने पर जब वह डॉक्टर के पास जाता है, तब सर्वप्रथम डॉक्टर पुछताछ करते है की उसके वंश (खानदान) में इससे पूर्व यह रोग किसी को कभी हुआ है क्या? उसके पिछे यही कारण है की यह रोग वंशपरंपरागत (खानदानी) होता है। इसलिये ये रोग होते है और उसका इलाज करने पर भी वह रोग उस खानदान में आगे किसी को नही होगा इसकी ग्यारंटी डॉक्टर से नही मिलती। इसका कारण "खून का रिश्ता" ऐसा वे बताते है।

        महानत्यागी बाबा जुमदेवजी ने इस पर बहुत संशोधन किया है और इन असाध्य रोगों पर मात देकर इस मार्ग में वे साध्य किये है। इनका संशोधन इस प्रकार है।

         डॉक्टरों के निष्कर्षानुसार वंशानुगत (पीढी-दर-पीढी) बीमारी होने का कारण "खून का रिश्ता" होने से वह उस परिवार में हर एक को कम ज्यादा प्रमाण में होना चाहिए लेकीन ऐसा होता नही वह एकाध में ही रहता है। कभी कभार दो-तीन पीढियों के बाद आता है। उस परिवार (खानदान) में वह रोग जिस व्यक्ती को हुआ होगा। उस व्यक्ती के मरणोपरान्त उसकी आत्मा को शांती न मिलने से और मोक्ष न मिलने से भटकता रहता है। वह आत्मा जिस परिवार से बाहर आती है। वह पुनः उसी परिवार में जाने की कोशिश करती है। और लगभग वहीं जाती है। तब उस परिवार में वह आत्मा जाने पर जिसे वह स्पर्श करती है उसे वह बिमारी जकडती है। और जब तक उस आत्मा को शांती अथवा मोक्ष नही मिलता तब तक वह रोग उस परिवार में वंशानुगत होता रहता है।

          जिसे व्यक्ती को ऐसा रोग हुआ है वह व्यक्ती इस मार्ग में आने पर उस पर भी वह देवीशक्ती कार्य करती है। और जिस आत्मा का उसे स्पर्श हुआ होगा उस पर भी मात करती है। तथा उस आत्मा को लक्ष चौरासी भोग से मुक्त करती है। वह भटकती नही, और उसके बाद वह आत्मा किसी को भी स्पर्श नही करती। इसलिये उस परिवार में वह दुःख पुनः किसीको भी नही होता। इस प्रकार वंशानुगत रोग नष्ट होते है, और उस परिवारकी उस रोग से मुक्तता (छुटकारा) होती हैं।

          यही सिध्दांत संसर्गजन्य रोगों के लिये लागू होता है कुछ संसर्गजन्य रोग उदा. कावीळ(पिलीया) यह धूलीकरण से होता है। वातावरण में बदलाव से अनेक रोग उत्पन्न होते है। वातावरण बदलना यह भी उस सृष्टिनिर्माता परमेश्वर का कार्य है। वही दैवीशक्ती इस कदर मात कर सकती है। इसलिये यह रोग भी इस मार्ग में उस दैवी शक्ती के कारण ठीक होते है।

नमस्कार...!

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प्रकरण क्रमांक:- (२५) "सौराष्ट्र दौरा"

               "मानवधर्म परिचय"


"मानवधर्म परिचय पुस्तक" (हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती



            "मानवधर्म परिचय पुस्तक"

                 प्रकरण क्रमांक (२५)

                     "सौराष्ट्र दौरा"


प्रकरण क्रमांक:- (२५) "सौराष्ट्र दौरा"


         महानत्यागी बाबा जुमदेवजीने एक परमेश्वर की प्राप्ती करने के बाद मानव धर्म स्थापन किया। यह नया धर्म होने से वे दिन रात इस मार्ग का प्रसार करने के लिए और मानव जागृती होंगी इसलिये मार्गदर्शन करने के लिये पिछले ५६ वर्षों से लगातार गाँव- गाँव देहातों में दौरा कर रहे है। इसलिए यह मार्ग अनेकोंने स्विकार किया है। आजकी स्थिती में इस मार्ग में हजारो परिवार के लोग सेवक है। पहले इस मार्ग पर आनेवाले परिवार की संख्या कम थी। मगर जैसे जैसे लोगों को आत्मानुभव आने लगा। वैसे उनकी संख्या बढने लगी। निम्न तालिका से यह ध्यान में आता है।

१९४७ से १९७० तक २३८ परिवार
१९७१ से १९८० तक १,१२६ परिवार
१९८१ से १९९० तक ३,३५२ परिवार
१९९१ से २००० तक १०,५०६ परिवार
२००१ से ३१ डिसेंबर २०१० तक २४,९८८ परिवार
२०११ से २०१४ तक ४२,६८५ परिवार
२०१५ से २०१८ तक ४६,००० परिवार

        सुरुवात में ज्यादा सेवक ना होने का कारण है यह मार्ग एकदम नया है। पुरानी संस्कृती छोडकर नई संस्कृती की यह निर्मिती है। सालों-सालों से लोगों में जो पुराने आचार-विचार है। जो भावनाएँ है, उनकों छोड देना लोगों को जमता नही। लेकीन इस मार्ग का सेवक होने के बाद उन्हें जो आत्मानुभव आता है वह देखकर इस नई संस्कृती में लोगों का आगमन हो रहा है। गाँव-गाँव बाबा ने दौरा करने से इस मार्ग के सेवक भारत के चारोही हिस्से में फैले है। इतना ही नही तो अमेरिका में भी इस मार्ग के सेवक है। ऐसा ही एक दौरा १९८२ साल में २० नवंबर से ५ दिसंबर तक सौराष्ट्र में किया गया| इस दौरे में
महानत्यागी बाबा जुमदेवजी के साथ गाँव-गाँव से साधारणतः ५० सेवक थे। बाबा व्दारा किए हर दौर में विशेष अनुभव आते है। सौराष्ट्र दौरे में भी ऐसे अनेक अनुभव आए। वे अनुभव परमेश्वरने किस प्रकार से दिए यह आगे के उदाहरणों के व्दारा ध्यान में आएगा।

            महानत्यागी बाबा जुमदेवजी साधारणतः ५0 सेवकों के साथ दिनांक २० नवंबर १९८२ को शाम ७ बजे हावडा-अहमदाबाद एक्सप्रेस से सुरत को जाने के लिए निकले। २१ नवंबर को दोपहर १:३0 बजे वे सुरत मे पहुँचे। दिनांक २२ नवंबर को निंबायत खाडी सुरत में हवन कार्य पूरा करने के बाद वहा के सेवकों को परिचय बाबा को करा दिया गया। तत्पश्चात वहा पर उपस्थित सेवकों ने इस मार्ग की दीक्षा लेने का कारण और उनके आत्मानुभव इस पर चर्चा हुई। रात ८ बजे मानव जागृती पर अनुभवात्मक भजनों का कार्यक्रम होकर बाबा के मार्गदर्शन हुए। बाद में भोजन करके आराम किया।

         दिनांक २३ नवंबर १९८२ को सुरत शहर देखने का तय हुआ। इसलिए बाबा सेवकों के साथ सुरत दर्शन के लिए दोपहर १ बजे निकले। निकलते समय बाबाने सभी सेवकों को आदेश दिया की, हम किसी भी मंदिर में गए तो वहाँ की मुर्ती को नमस्कार ना करें सिर्फ मानव व्दारा निर्मित कला देखें, क्योंकी परमेश्वर पत्थर में नही, वह निर्जिव वस्तुमें नही तो सजीवों में है।

           सुरत शहर देखते-देखते वे अंबा माता के मंदिर में गए। वहा बाबाने फिर सभी को याद करा दी की मुर्तीं को नमस्कार ना करे हम यहाँ इस देश की कला देखने को आए है। इसलिए कला देखकर आगे जाएँगे। मंदिर देखने के बाद सभी नीचे आए। मंदिर की सिढीयों के बाजू में निचे के हिस्से में हुनुमानजी का मंदिर था। सभी मंदिर के बाहर निकले लेकीन हेमराज सातपुते और आसारामजी सव्वालाखे यह पीछे रह गए। हुनुमानजी का मंदिर होने से और इस मार्ग के प्रतिक बाबा हुनमानजी होने से हेमराज सातपुते इनका मन पिघला और "तेथे कर माझे जुळती" इस कहावतनुसार उन्होने श्रध्दासे उस हुनुमानजी की मुर्ती को नमस्कार किया। यह आसारामजी सव्वालाखे इन्होने देखा लेकीन दोनो ने इस बारे में आपस में चर्चा नही की। तत्पश्चात यह अपनी गलती हुई यह उन्होने बाबाको नही बताया। वहा उन्होने बाबा के शब्दों का पालन नही किया। उन्होने बाबाके आदेशों का पालन नही किया और बाबा के आदेशों का अपमान किया तात्पर्य बाबा के आदेश, उनके शब्द यह परमेश्वर के शब्द होने से तो इसका अर्थ परमेश्वर का अपमान हुआ था। इसके बाद आगे साईनाथ मंदिर, तापी नदी, चमडीभर जगह देखने के बाद आगे अश्विनीकुमार, तीन पत्ती यह भाग सभीने देखा, लेकीन वहा वास्तव में तीन पत्ती की जगह पाँच पत्ती थी। सभी ने बाबाके आदेश का पालन कर के किसी भी मंदिर में प्रणाम नही किया। सिर्फ सृष्टी सौंदर्य नये-नये बनाए गए कलात्मक मंदिर, भव्य इमारते इत्यादी और रमणीय स्थल देखे। अश्विनीकुमार, तीन पत्ती देख वहाँ से शाम को निंबायत खाडी यहा वापस आने के लिए निकले। सुरत दर्शन के लिए स्पेशल बस की गई थी।

           वापस आते समय बस के सामने एक आदमी आया और उसे बचाने के लिए बस के ड्रायव्हर ने जोर से ब्रेक लगाया। सातपुते यह पीछे बैठा था और आसारामजी सव्वालाखे यह सामने की सीटपर जो पाँच बैठे थे उसमें एक यह था। ब्रेक जोर से लगाने से बस एकदम रुकी और बसे के सेवक लोग अपने-अपने सीट पर उछाले गऐ लेकीन हेमराज सातपुते उसकी सिट से उछलकर आसारामजी सव्वालाखे के उपर जाकर गिरा। वैसे ही हेमराज सातपुते यह सव्वालाखे की सीट से ३-४ सीट पीछे बैठा था। इस घटना से सव्वालाखे के छाती को जोर से मार लगा इसलिए वह मै मर रहा हूँ ऐसा जोर से बसने चिल्लाने लगा। इसके बाद बस सीधे डॉक्टर के पास लाई गई। वहाँ उसपर औषधोपचार किया गया। एक्सीडेंट की केस होने से डॉक्टर औषधोपचार करने को तैयार नहीं था। लेकीन बाबा की महिमा सुनकर उन्होने औषधोपचार किया। यह कैसे हुआ यह डॉक्टर ने पुछने पर उन्हें बताया गया की सव्वालाखें पर सातपुते पाच फुट जगह से आकर गिरा तब डॉक्टर ने कहाँ की बहुत बडी जखम हुई है, लेकीन दवा दी गई है, आराम होगा। इसके। बाद निबायत खाडी में सभी लोग वापस आए।

       रात्री ८.00 बजे उधना यार्ड, सुरत में सेवको के अनुभवात्मक भजनकार्य सेवकों के अनुभव इस पर चर्चा सत्र हुआ और अंतमें मानव जागृतीपर बाबा ने मार्गदर्शन  किया। यह कार्यक्रम चालु था तब सव्वालाखे निंबायत खाडी में आराम कर रहा था। उसकी तबियत को पुरी तरह आराम नही था। बाबाने सेवकों को कौनसी गलती हुई यह पाने पर कोई भी बताने को तैयार (राजी) नही था। क्योंकी किसी के भी ध्यान में उसकी गलती  नही आयी। बाद में श्री. सव्वालाखे इनको अपने हाथसे हुई गलती ध्यान में आयी और उसने एक सेवक के व्दारा जहाँ कार्यक्रम शुरू था उस जगह पर अपनी हुई गलती की जानकारी देने के लिए भेजा। बाबा को यह बात मालुम होने पर वे निंबायत खाडी को कार्यक्रम समाप्ती के बाद वापस आए। उन्होने सातपुते को पुछने पर उसने हामी भरी की, मैने हनुमानजी के मंदिर में प्रणाम किया और सव्वालाखे ने वह देखा। मैंने आपके आदेश का उल्लंघन किया यह मेरी बडी गलती हुई है, ऐसे बाबा और उपस्थित सेवकों को बताकर वह आगे बोला की, मेरे हाथो हुई गलती के लिए भगवान बाबा हनुमानजी और महानत्यागी बाबा जुमदेवजी और सेवक भाई माफ करेंगे। ऐसी उसने बाबाको बिनती की, इसलिये बाबाने दोनो के व्दारा हुई गलती के लिए माफ किया और उधर सव्वालाखे की तबीयत को आराम पहुँचा। तत्पश्चात सव्वालाखे को एक घंटे में तीन बार बाबा हनुमानजी को क्षमा माँगने के लिए कहा गया। इस प्रकार बाबाने दोनों को क्षमा माँगने के लिए कहा गया। इस प्रकार बाबाने दोनों को क्षमा करके उन्हें उनके व्दारा की गई गलती से मुक्त किया। लेकीन यह गलती पहले ही बताई होती तो उन दोनों पर यह नौबत नही आती।

         इस से यह सिध्द होता है की, गलती छुपाकर रखने और उसमे भी बाबाके आदेशो का पालन नही करने पर कितना बड़ा दुःख होता है, जैसे चोरी करनेवाले से भी चोरी करने के लिए बताने वाला आदमी यह बडा गुन्हेगार होता है। उसी प्रकार गलती करनेवाले से गलती छुपाकर रखनेवाला ज्यादा गुन्हेगार है यह सिध्द होता है। वैसे ही परमेश्वर को गलती की क्षमा माँगने पर वह मानव को क्षमा करके उसके दुःख दूर करता है। इतना परमेश्वर दयालु हैं।

       उस दिन रात्री को १२ बजे खाना खाने के बाद कुछ लोग वहा पर सोए थे, तो कुछ लोग जगह की कमी से दुसरे सेवकों के यहाँ २-३ जगह सोने के लिए गए थे। रात दो बजे के दरम्यान सभी सेवकों को उलटी और संडास होने लगा। इससे बाबा को और सभी को लगा की खाने में विष बाधा हुई होगी। वहा बाबांने ऐसा आदेश दिया की, जहाँ-जहाँ सेवक रुके है वहां से उन सेवकों की जानकारी लाए। इस प्रकार जानकारी लेने पर। जिस-जिस जगह सेवक रुके थे उस-उस जगह जिन सेवकों ने भोजन किया था उन सभी को वमन(उलटी) और दस्त है यह समझा। यह समझने पर बाबाने श्री. शिरपूरकर सेवक को बताया की आस-पास कोइ डॉक्टर होगा तो उसे बुलाकर लाओं। क्योकी यह भोजन की विषबाधा है। सभी सेवक परमेश्वर के नाम का जयघोष करने लगे। शिरपुरकर
डॉक्टर के पास जाने पर उन्हे डॉक्टर ने पूछा की उलटी कैसी होती है। तब ईश्वरी कला उसी क्षण शिरपूरकर को उलटी आयी और डॉक्टर के सामने उलटी (वमन) करके ऐसे उलटी करते है और लगातार दस्त भी करते है ऐसे बताया। वे डॉक्टर को लेकर आए। डॉक्टर ने सभी को जाँचकर इन्जेक्शन दिए और दवाईयाँ भी दी। छोटे बडे सब मिलाकर २०० सेवकों को विषबाधा हुई थी। इसलिए बाबाने डॉक्टर को बताया की आप इन सभी पर कही से भी दवा उपलब्ध करके औषधोपचार करे। क्योंकी यह विषबाधा होना ठीक नही। ऐसी घटना होना यह ठीक नही। क्योंकी हम नागपूर में रहते है। भगवत कार्यका दौरा करते है। बाबाने बताए नुसार डॉक्टर से सभी का इलाज करके विषबाधा से सभी को बचाया। कुछ सेवक काफी दूर सोने को गए थे। उनकी तबियत के बारे में उस दिन जानकारी नही मिल सकी। लेकीन दूसरे दिन सुबह ऐसे पता चला की उन्हें भी विषबाधा हुई थी। उन्होने भगवंत के नाम से (बाबा हनुमानजी) तीर्थ लेने से बिना दवा के उनकी विषबाधा नष्ट हुई उस दिन रात को सभी औषधोपचार के बाद शांती से सोए। कोई भी बुरी घटना नही घटी। परमेश्वर ने सभी को जीवनदान दिया।

         दूसरे दिन डॉक्टर ने बाबा को अपने घर में चाय पिने के लिए निमंत्रित किया था। तदनुसार बाबा सेवकों को लेकर उस डॉक्टर के घर पर चायपानी लेने गए। तब डॉक्टर ने बाबा को बताया की रात में हुई विषबाधा यह भयंकर रुवरुप की थी। औषधोपचार करने पर भी वह दवा से नियंत्रित होनेवाली नही थी। उलटे कई लोग मर गए होते, लेकीन कोई भी नही मरा इस पर से आपके पास बहुत बडी परमेश्वरी शक्ती है ऐसा मुझे लगता है। इस पर बाबाने डॉक्टर को मार्गदर्शन करके बताया की, इस मार्ग में जागृत शक्ती है। इसलिए कोई भी नही मरा, इस परमेश्वरी कृपा का अनुभव इस मार्ग के अनेक सेवकों को आया है।

             २४ नवंबर ८२ को पटेलवाडी सुरत में सेवकों का परिचय, अनुभव कथन और बाबा का मार्गदर्शन हुआ। उस के बाद २५ नवंबर ८२ को रात १०.३० बजे बस से अहमदाबाद को बाबा सेवकों के साथ जाने के लिए निकले। २६ नवंबर को बापू नगर, मोरारजी चौक, अहमदाबाद यहाँ भगवत कार्य का चर्चा सत्र, अनुभव परिचय और बाबा का मानव जागृती पर मार्गदर्शन हुआ। २७ नवंबर अहमदाबाद दर्शन के लिए बस से निकलकर झुलता मिनार, गोमतीनगर, काकडीया तालाब, बालवाटिका, अपना बाजार, सिध्दी सय्यद की जाली, भद्रकाली मंदिर, हरिसिंग की बाडी, गांधी आश्रम, मानव मंदिर, ओपन सिनेमा हॉल, विज्ञान भवन, भाव निर्झर आदी ऐतिहासिक स्थल देखे। सेवकों ने मंदिरों में नमस्कार नही किया। तो सिर्फ मानव व्दारा बनाई हुई कलाकृती देखेी।

        २८ नवंबर को सौराष्ट्र देखने के लिए स्पेशल बस से सभी सेवक जामनगर से व्दारकापुरी आए। यहाँ सुदामपुरी, व्दारका मंदिर, अरब सागर देखा। बाद में सागर में बसने वाले व्दारका मंदिर में जाने के लिए सभी नाव से निकले। नाव में ५० सेवक और ५० लोग दुसरे ऐसे कुल १०० लोग बैठे थे। बाबा नाव के उपर वाले हिस्से में बैठे थे। नाव चालु  हुई, नाव पानी में जाते समय वह दोनों बाजु में डोलने लगी। तब नाविक बहुत घबराया, उसके ध्यान में आए ना की, हवा नही होने पर भी नावं क्यों डोल रही है। तब सेवकों ने बाबा हनुमानजी का जयघोष किया। उसमें बाकी लोग भी सामील हुए और नाव का डोलना बंद हुआ। उसके बाद नाव सुरक्षित व्दारका मंदिर पहुँची। जब नाव समंदर से जा रही थी। तब जोरो की हवा चालु नही थी। समंदर की लहरे भी जोर से नही आ रही थी। नाव ने हिल्लोरे लेना यह परमेश्वरी लिला थी ऐसा बाबा का कहना था।

         व्दारका मंदिर के परिसर में पहुँचने पर बाबाने हमेशा की तरह सभी सेवकों को किसी भी मंदिर में प्रणाम ना करे ऐसा आदेश दिया। परिसर में जाते ही कृष्ण मंदिर के पास सभी पहुँचे। व्दारका नगरी के मुख्य व्दार बंद थे। वे शाम को ५ बजे खुलने वाले थे। तब तक सभी व्दार खुलने का इंतजार करके वही रुके। ठिक ५ बजे मुख्य व्दार खोला गया। वहा से सभी सुदाम महाराज की बैठक में गए । वहाँ जो सुदाम महाराज थे वे बैठक में आए और अपने सिंहासन पर बैठे। उस जगह ऐसी एक प्रथा है की पहले सुदाम महाराज लोगों को मार्गदर्शन करके उनके तरफ से दान वसुल करते है और उसके बाद ही आगे व्दारका नगरी देखने के लिये लोगों को अंदर जाने देते। इस प्रकार से सुदाम महाराज अपने आसनपर बैठने के बाद बाबा के साथ सभी सेवक और बाकी लोग नीचे बैठे। बाद में सुदाम महाराज ने मार्गदर्शन करने के लिए सुरुवात की, बताने लगे यह कृष्ण की व्दारका है। इसलिए पुण्य प्राप्त करने के लिए अपनी शक्तीनुसार सभी ने ५०१,१००१,५००१ रुपये दान करे। यह सुनकर बाबांको आश्चर्य हुआ, इस मार्ग के एक सेवक श्री. नागोराव खापरे को बाबाने कहाँ की, उस सुदाम महाराज को बताओं की हमारे साथ हमारे धर्मगुरु महानत्यागी बाबा जुमदेवजी है। वे निष्काम भावनासे कार्य करते है, वे गुरूपुजा लेते नही और दान भी लेते नही। इसलिए हम आपको दान दे नही सकते । इस प्रकार नागोराव खापरे ने सुदाम महाराज को सभी के सामने बताया। तब यह सुनकर वहाँ के पुजारीयों ने सेवकों के विरुध्द कारस्थान रचाया की इन्हें दर्शन लेने नही देंगे। वहाँ से सभी कृष्ण मंदिर के पास आए, वहां सभी मंदिर के व्दार खुलेंगे इस उम्मीद से रुके। लेकीन कारस्थान किए नुसार वहा के पुजारी एक के बाद एक वापस जा रहे थे, लेकीन कृष्ण मंदिर के व्दार नहीं खोले। तब वही बाबाने सभी सेवकों को मार्गदर्शन करके उनके साथ जो बाकी लोग थे । उनके ध्यान में लाकर दिए की इस देश में पूजारीयोंकी कितनी सत्ता है की, वे दान दिए। बैगैर भगवान के दर्शन लेने नही देते। पूजारी लागों ने भगवान को बेचने के लिए निकाला है। लेकीन भगवान मंदिर में नहीं वह तो मानव के पास है। उसकी आत्मा में है इसिलिए। कहा गया है की,

"मंदिर, मस्जिद, गुरुव्दारोने बाँट लिया भगवान को,
सागर बॉँटो, धरती बाँटो, मत बाँटो इन्सान को"।

मानव को आपस में बाँटो मत क्योंकी उसको बाँटने से भगवान को (परमेश्वर को) बाँटे समान होगा। बाद में बाबाने सभी सेवकों को आदेश किया की बाबा हनुमानजी का जयघोष कर के वापस चले। इस प्रकार सभी सेवकों ने निम्नानुसार जयघोष किया

भगवान बाबा हनुमानजी की जय।
महानत्यागी बाबा जुमदेवजी की जय।
परमात्मा एक।।

सत्य, मर्यादा, प्रेम कायम करनेवाले
अनेक बुरे व्यसन बंद करनेवाले
मानव धर्म की जय।

        और सभी सेवक मुख्य व्दार के बाहर निकले। एक सेवक श्री. केशव चिचघरे सब के पिछे रह गया, मुख्य व्दार के पास एक साधु धुनी लगाकर बैठा था। केशव चिचघरे जब गेट के पास आया तब एक पुजारी ने ऐसे कहा की, इन्होने दान दिया नही इसलिए इनकी नाव पाणी में डुूबेगी। यह शब्द उस साधू के सुनने पर उसके बदन में जैसे आग लगे समान हुई और उसने क्रोध से उस पुजारी को उत्तर दिया की तुम पुजारी अपने को क्या समझते हो ? उन सभी पर परमेश्वर की कृपा है इसलिए वे कुछ भी ना बोलते निकल गए। आप पुजारी इतने नीच हो की, यदी किसने ने दान दिया नही तो आप उन्हे भगवान के दर्शन लेने नही देते, यह सब केशव चिचघरे ने सुनने पर उन्होने बाबा को बतलाया तब बाबाने कहा की यह सब मुर्ख लोगों की सत्ता परमेश्वर को मान्य नही और वह जल्दी ही बदलेगी इसलिए इस मार्ग की उत्पत्ती है।

           बाबा व्दारका में आराम करने के लिए एक जगह ठहरे। वहाँ किसी कारणवश सेवकों का भोजनवाले कॉन्ट्रक्टर से बहुत झगडा हुआ। तब बाबाने सभी सेवकों को समझाया लेकीन उस कॉन्ट्रॅक्टर की बहुत आर्थिक हानी हुई। ३० नवंबर को व्दारका से पोरबंदर को सभी पहुँचे। वहाँ भारत मंदिर, दवाखाना और गांधीजी का मकान सभीनि देखा। वहा से सभी लोग सोमनाथ को पहुँचे। वहा सोमनाथ के ऐतिहासिक मंदिर देखकर समंदर किनारे के सृष्टी सौंदर्य देखे। तत्पश्चात वहा रात्री में मुकाम कर के १ दिसंबर को जुनागड में सभी लोग गए। जुनागढ का किला ९,९९९ सिढीओवाला पहाडी पर का
देवस्थान देखे, वहाँ से वीरपूर को जाकर "जलाराम बापू का" मंदिर देखे। सह मंदिर देखने के बाद बाबाके मन में विचार आए की हम भी कही पर अच्छी सी जगह प्राप्त कर के इसी प्रकार का "मानव मंदिर" का भवन अपने मंडल व्दारा बनाए। उस जगह हमारे सेवकों को सुख, शांती और समाधान मिलेगा। इस तरह यहाँ से प्रेरणा लेकर बाबाने नागपूर यहाँ"मानव मंदिर" बनवाया है।

       वीरपूर से गोंडल को जाने पर योगी महाराज के मंदिर देखे २ दिसंबर को गोंडल से आकोट होते सारंगपूर को गए। वहा लक्ष्मीनारायण का मंदिर तथा हनुमान मंदिर की कलाकृती सभी ने देखी। वहा से ३ दिसंबर को फिर अहमदाबाद को वापस आए दर्शाए गए सभी स्थानो पर सभी सेवक मंदिरों में घुमे लेकीन बाबा के आदेशानुसार किसी भी सेवकने, किसी भी मंदिर में किसी भी मुर्ती को नमस्कार (प्रणाम) नही किया।

      ३ दिसंबर को पुराना बापूनगर, अहमदाबाद में रात ८ बजे मानवी अनुभवों पर भजनकार्य और मानव जागृतीपर बाबा का मार्गदर्शन हुआ। तब बाबाने अपने मार्गदर्शन में बोले की, मंदिरों में किसी भी मुर्ती को नमस्कार किसी ने नही किया, क्योंकी बाबा सजीव में परमेश्वर का रुप देखते है। निर्जिवो में परमेश्वर रहता नही है। मुरती यह निर्जीव चिज है। इसलिए बाबा के सेवक किसी भी मुर्ती को प्रणाम (नमस्कार) नही करते। वे परमेश्वर का रुप सजीवों में देखते है इसलिए उन्हें आत्मप्रचिती, आत्मानुभव और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। इसलिए सेवकों की आत्मशक्ती बढती है। भावना का नाश होता है और मानव यह अनुभव से तज्ज्ञ होता है वह भगवंत को सामने रखकर आत्म साक्षात्कार से अपना भविष्य उज्वल करता है।

      ४ दिसंबर को नया बापूनगर, अहमदाबाद में रात ८ बजे मानवी अनुभवात्मक चर्चा बैठक, भजन कार्य, सेवकों का अनुभव तथा मार्गदर्शन होकर ५ दिसंबर को अहमदाबाद हावडा एक्सप्रेससे नागपूर को प्रस्थान करके ६ दिसंबर १९८२ को सुबह ७ बजे नागपूर को आगमन हुआ।

         इस सौराष्ट्र दौरे में जो-जो घटीत हुआ उसको सब परमेश्वरी कृपा कारणीभूत है और उसीने ही परेस्थिती निर्माण करके उसे पूरी तरह संभाला है। इसका कारण मानव यह कर्मकर्ता होने से उसके हाथो गलती होना स्वाभाविक है। और वह गलती करता है। तो उसका परिणाम गलती बराबर का ही होता है। यही परमेश्वर मानव को सिखाता है। विदित सभी घटनाओं से यह सिध्द होता है की, बाबा के साथ भगवंत हमेशा रहते है। इसलिए उनके सामने सेवकों पर कितनी ही मुसिबते या समस्या निर्माण होने पर वह सभी चुटकी बजाएँ समान बडी आसानी से छुटती है।

नमस्कार..!

लिखने में कुछ गलती हुई हो तो में  "भगवान बाबा हनुमानजी"और "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" से क्षमा मांगता हूं।


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Thursday, May 21, 2020

प्रकरण क्रमांक:- (२४) "ईच्छा अनुसार भोजन"

                  "मानवधर्म परिचय"


"मानवधर्म परिचय पुस्तक" ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती



             "मानवधर्म परिचय पुस्तक"

                 प्रकरण क्रमांक (२४)

               "ईच्छा अनुसार भोजन"


प्रकरण क्रमांक:- (२४) "ईच्छा अनुसार भोजन"


        मोगरकशा तालाबपर घटित घटना से सभी कुशलतापुर्वक शाम को मंगरली इस में पहूँचने पर महानत्यागी बाबा जुमदेवजी की प्रमुख उपस्थिती में भगवत कार्य की चर्चा बैठक प्रारंभ हुई। बैठक में उपस्थित सेवकों ने इस मार्ग पर जो तत्व शब्द और नियम सिखाये है साथ ही इस मार्ग की उपासना करने पर उन्हें जो अनुभव आये उसपर अपने-अपने विचार व्यक्त किये। तत्पश्चात बाबाने मार्गदर्शन किया। सभी लोग आनंदमय वातावरण होने से बैठक बहुत देर तक चली। उस समय रात के बारह बजे थे।

         बैठक समाप्त होने पर महानत्यागी बाबा जुमदेवजीने उस गाँव के सेवकों से कहा, "हमें अभी केवल दूध की चाय पिनी है इस गाँव में आये दो दिन हुए। लेकीन दध की चाय नही मिली। वह अब चाहिए।" ऐसी बाबांने इच्छा प्रकट की, यह सुनकर सेवक हड़बडाया और उसने बाबा से बिनती की, की इतनी मध्यरात्री के समय इस गांव में दूध कहाँ से मिलेगा? घर में भी दूध नही है। क्योंकी मेरे घर की भैंसे जंगल में चरने गई थी। तब बछडे भी उसके साथ थे। उन बछडो ने भैस का संपूर्ण दुूध पी लिया। भैंस जब शाम को जंगल से चरकर आयी तब मैं दूध निकालने के लिये गया था तब भैंस ने एक बुंद दूध नही दिया। अब बताओं बाबा मैं दूध की चाय कैसे पिलाऊँ? तब बाबाने कहा, मुझे मालुम नही की दुध कहाँ मिलेगा। तुम दूध कही से भी लाओ और हमें केवल दूध की चाय पिलाओं। वह सेवक गवली (ग्वाला) था और सामान्यतः अस्सी साल का बुजुर्ग था। उसने बाबा से कहा, बाबा इस जंगल में आस पास एक भी गांव नहीं। और इस गांव में रात में दुूध नही मिलता। यह मेरे जीवन भर का अनुभव है। तब बाबा जुमदेवजी ने कहा, मुझे तुम्हारा अनुभव मालुम नही और उसका कुछ करना भी नही है। हमें दूध की चाय अभी चाहिए । तब उस सेवकने बाबा को बिनती की, की बाबा आप मुझे मार्गदर्शन करें की मुझे दुध कहा से मिलेगा?

        महानत्यागी बाबा जुमदेवजी सभी को संबोधित करते हुए कहा, मैंने एक परमेश्वर की कृपा प्राप्त की है, भगवंत दूध देगा। तत्पश्चात बाबांने उस सेवक से कहा, जिस भेसने एक भी बुंद दूध नही दिया उसी भैंस को सामने लाओ और घर में जाकर बाबा हनुमानजी की प्रतिमा के समक्ष अगरबत्ती लगाकर कपूर लगाओ और बिनती करो की, बाबा हनुमानजी, महानत्यागी बाबा जमदेवजी को दूध की चाय चाहिय। अतः बाबा के लिए दुध दो। बाबां के ऐसा कहने पर उस सेवक ने बाबा के आदेश का पालन किया और उपरोक्तानुसार बिनती की तत्पश्चात वह बाहर आया। भगवंत का नामस्मरण कर उसने उस भैस की पीठपर जोर से थाप मारी और बर्तन लेकर वह भैस का दूध निकालने लगा। आश्चर्य की बात यह की जिस भैंसने दूध नही दिया था। उसी भैंस का दूध चर-चर कर निकालने लगा। उस भैंसने लगभग दो लिटर दूध दिया। इस मार्ग का सेवक नवरगांव का सरपंच श्री. वाघमारे यह गवली के पास देखने लगा। तो उसे दूध से भरा हुआ बर्तन दिखा। उसने वह गंजी(बर्तन) लाकर बाबांके पास रखा। तब सब लोग भगवंत की यह लिला देख कर अवाक रह गये। तत्पश्चात बाबांने उस सेवक से कहा, इस संपूर्ण दुध की चाय बनाओ। उसमें जरा भी पानी मत डालो तथा बुंद भर दूध भी नही बचाना। तदनुसार उस संपुर्ण दूध की चाय बना कर वह सभी को दी गयी।

           उस वृध्द गवली सेवक ने बाबा से कहा की बाबा इसी भैंस की तरह दुसरी भैंस भी दूध देगी क्या? इस पर बाबांने जवाब दिया। तुम अपना अनुभव लेकर देखो। तुम एकही भगवंत के मन से सेवक हो और दिये गये तत्व, शब्द, नियम से चलते होंगे तो परमेश्वर अवश्य लाभ देगा। परमेश्वर देता है लेकीन मानव का परमेश्वर पर विश्वास नही।

       इसलिये बाबाने तत्वों में बताया है की,"इच्छा अनुसार भोजन" अर्थात मानवने कोई भी इच्छा परमेश्वर के सामने प्रकट की तो वह उसे पुरा करता है। लेकीन उसके लिये एक लक्ष, एक चित, एक भगवान मानकर सत्य कर्म करना चाहिए।

नमस्कार..!

लिखने में कुछ गलती हुई हो तो में  "भगवान बाबा हनुमानजी"और "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" से क्षमा मांगता हूं।

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प्रकरण क्रमांक:- (२३) "मोगरकसा तालाब"

                "मानवधर्म परिचय"


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                  "मोगरकसा तालाब"


प्रकरण क्रमांक:- (२३) "मोगरकशा तालाब"


         सतयुग की कथाएँ हम इतिहास में पढ़ते है। रामायण में ऐसा उल्लेख हैं की जब श्रीराम चौदह वर्ष के लिये वनवास गये थे। तब भरत ने श्रीराम की पादुकाएँ राजसिंहासन पर रख कर उनके नाम से राजकाज सुव्यवस्थित चलाया था। उद्देय यह की, श्रीराम यह सत्य आचरण करनेवाले मर्यादा पुरुषोत्तम थे। वही लक्षण उनकी पादुका में थे। इसलिये राजकाज सुव्यवस्थित चला। लेकीन इस कलियुग में भी पादुकाओं को उतना ही महत्व है। महानत्यागी बाबा जुमदेवजी के रुप में, बाबा हनुमानजी जब मोगरकशा तलाब देखने गये थे, तब की यह घटना है। एक जोडनांव जो पानी से संपूर्णतः भरने के बावजुद तालाब में ना डुबते हुए तैर रही थी। और उसमें सवार सेवक जीवित रहा। यह एक परमेश्वर का साक्षात्कार है। १९७८ साल मे अप्रैल महिने में महानत्यागी बाबा जुमदेवजी ने परमेश्वर के प्रति मानवों को जागृत करने के लिये हमेशा की तरह सात सेवक साथ में लेकर रामटेक के कुछ गावों का दौरा निकाला। १/४/१९७८ को महानत्यागी बाबा जुमदेवजी नागपूर के अपने सेवकों के साथ नागपूर-रामटेक होकर भंडारबोडी के परमात्मा एक सेवक दुग्ध उत्पादक सहकारी संस्था में पहुँचे, वहाँ बाबांके भगवत् कार्य पर मार्गदर्शन हुए। दुसरे दिन दो अप्रैल को बाबांने सेवकों के साथ पांच बैलगाडी लेकर कांद्री का दौरा किया। वहाँ भगवत् कार्य की चर्चा और बाबांके मार्गदर्शन होने पर मुकान किया। ३ अप्रैल को पंचाळा का दौरा होकर ४ अप्रैल को मंगरली इस गांव में दौरा किया। इस गांव के दौरे में नागपूर सहित लोहारा, कांद्री, सिवनी, भंडारबोडी, सालईमेटा, पंचाळा, मांडवी इन गांवो के बहुतसे सेवक भी थे।

         मंगरली यह गाँव घने जंगल के बीच बसा हुआ १५-२० मकानों का छोटासा गांव है। इस गांव में इस मार्ग में आये हुए दो सेवक रहते थे। उनमे से एक सेवक बाहरगाँव शादी में गया था। इसलिये बाबां का मुकाम दुसरे सेवक के यहाँ हुआ। जिस सेवक के यहाँ बाबा रुके थे उस जगह उस सेवक का मामा भी रुका था। वह वयोवृध्द था। उसे पंद्रह दिनो से लगातार बुखार आ रहा था। इस गांव में भगवत् कार्य की चर्चा बैठक होकर बाबांने मानव जागृतीपर सेवकों को मार्गदर्शन किया।

       चर्चा बैठक के पूर्व वहाँ इस दौरे पर जो महिला मंडली आयी थी। उन्होने पूरा खाना बनाया था। चर्चा बैठक समाप्ती पर भोजन की तैयारी हुई। सभी सेवक तथा बाबा भोजन करने बैठे। साथ में आयी हुई महिलाओंने खाना (पंगत) परोसा। वह वृध्द बाबा के पास आया और उसने उन्हें नमस्कार किया। उसी पंगत (पंक्ती) में वह बाबां के आदेशानुसार खाना खाने बैठा। भोजन के पश्चात वह फिर से बाबां के पास आया और बाबा से नम्रतापूर्वक कहा की बाबा आप धन्य है मुझे पन्द्रह दिन से बहुत बुखार था जिसके कारण मैंने भोजन नही किया था। लेकीन आपके आगमन से और मार्गदर्शन से मेरा बुखार नष्ट हुआ और आज मैं भरपेट खाना खाया। यह कितना बडा चमत्कार की बाबां के आगमन से और मार्गदर्शन से सेवकों को ही नहीं तथापि अन्य लोगों को परमेश्वरी कृपा का लाभ मिलता है और उनके दुःख नष्ट होते है।

        जो सेवक बाहरगांव शादी में आया था। उसका नाम था शेरकी वह रात में शादी से वापस आया। उस रात में मंगरली इस गांव में ही मुकामहुआ। दुसर दिन अर्थात ५ अप्रैल को शेरकी नाम के सेवक ने बाबा जुमदवेजी को बिवती की, बाबा यहाँ से दस मिलपर मोंगरकशा नाम का एक ऐतिहासिक तालाब है। उसके चारों ओर घना जंगल है। बहुत मनोरम दृष्य है आप सब लोग वहाँ वनभोजन के लिये चले। इसपर बाबाने अनुमती  दी, सामान्यतः पुरुष तथा महिलाएं मिलाकर साठ सेवक उपस्थित थे। सभीने चाय-पानी, नाश्ता किया और सब लोग वनभोजन के लिये जाने की तैयारी करने लगे। सामान लेकर जाने के लिये बैलगाडी की आवश्यकता थी। तब सेवक का बुढामामा कहने लगा, एक बैलगाडी(बंडी) है। इसके बैल वृध्द है। उनमें से एक बैल ऐसा है की, उसको बाँधने के बाद  यदि नीचे बैठा तो उठता ही नहीं। उसके शरीरपर से ट्रक जाये फिर भी वह उठता नहीं ये शब्द बाबांने सुने। तब बाबांने कहा, बैलगाडी में उसी बैल को बांधे(जुंपे)। क्या होगा वह परमेश्वर करेगा और शीघ्र वनभोजन के लिये चलो। सब सेवक तैयार हुए सामान के लिये एक बैलगाडी और सेवकों के लिये खाधर(छोटी बैलगाडी) तैयार की जिस बेलगाड़ी में ज्यादा सामान था। उसमें पांच-छः सेवक बैठे थे। और उसी गाडी में वह बैल बाँधा गया वह गाडी नागपूर का एक सेवक जगन्नाथजी सोनकुसरे चला रहा था। वह बुजुर्ग भी बाबा के साथ वनभोजन के लिये आया। जाते समय वह सामनेवाले खाचर में बैठा था और बैलगाडी पीछे थी। उसे यही डर लग रहा था की, बैल चलते चलते निचे बैठता है क्या? इसलिए वह पिछे मुड़कर देखता था। लेकीन उसे वह बैल चलता ही दिखता था। यद्यपि वह बैल उसके साथी बैल के बराबर दौड रहा था। संपूर्ण प्रवास में वह बैल एक बार भी नीचे नहीं बैठा। इसलिये उस बसक्या बैल का उस बुजुर्ग को आश्चर्य हो रहा था। बाबा और उस बसल्या बैल का उस बुजुर्ग को आश्चर्य हो रहा था। बाबा और सभी सेवक मोगरकशा तलाव के पास पहुँचे, यह तालाब नागपूर जिले में है। अच्छी-सी जगह देखती
पेड़ों की छाँव में सभी सामान उतारा गया। वहाँ खाना पकाने के लिये लकड़ी पत्थर इकट्ठा किये। चुल्हा बनाया, दौरे पर आयी कुछ महिला मंडली तालाबपर से नहा कर आने के बाद खाना पकाने की तैयारी करने लगी। महिलाओं को बाबांने बताया की आप इस ओर स्नान करके आओ। वह पूर्व विरुध्द दिशा थी और पुरुष मंडली वह नांव (डोंगा)  दिखती है उसके अर्थात दक्षिण दिशा में पश्चिम की ओर से स्नान करने जायेंगे। मुकाम दक्षिण दिशा में था। खाना पकाना जारी होने पर बाबांने सभी सेवकों से (पुरुष) कहां की  चार-पांच सेवक यहाँ रुको और बाकी स्नान करने चलो। तद्नुसार सब सेवक बाबा के साथ नांव (डोंगा) वाली दिशा की ओर पश्चिम में स्नान करने निकले।

        वहाँ पहुँचने पर कुछ सेवकों को तैरना आता था, इसलिये उन्होने तैरने हेतुबाबा की। अनुमती के लिये उनसे बिनती की। उस समय वहाँ वनविभाग का चौकीदार था। उसने उन्हें (सेवकोंको) तैरने के लिये ना जाए इस हेतु बिनती की। क्योंकी तालाब में प्रारंभ में दो हीं दो हाथी, आगे तीन हाथी और मध्यभाग में चार हाथीकी उचाँई पाणी है। संपूर्ण । तालाब में बहुत जाले है। इसलिये वहाँ कोई भी ढिवर मछली पकडने अंदर नही जाता. क्योंकी जाले में पैर फँसा तो वह उपर नहीं आता और डुबकर उसका अंत होता है। ऐसा उसने कहा, उसपर बाबांने किनारे के पास तैरने की अनुमती दी। तत्पश्चात सेवक लोग तैरने लगे।

       पास में ही एक जोडनांव थी, एक सेवक ने जोडनांव पाणी में ले जाने हेतु बिनती की। तब बाबाने कहा यदि नांव चलानी आती हो तो ले जाओ। तद्नुसार वह नांव बाबा की अनुमती से उसकी रस्सी छोडकर अंदर ले गये। उसमें पांच-छः सेवक थे। उस समय बाबा किनारे पर बैठकर ही स्नान करने वाले थे। इसलिये उन्होने सेवकों से कहा, मैं नांव पर नही आता। नाव थोडी देर पानी में जाने पर जिन्हे तैरना आता था वे फटाफट नाव से पाणी में कुद पडे। उसके बाद वहाँ श्री मोतीरामजी हरडे (दिवाणजी) नामक एक सेवक नांव मे बाकी थे। क्योंकी वे तैरना नही जानते थे, दिवाणजी को लगा की अब मैं नांव चलाऊँगा। वे नांव के बाये तरफ खडे थे। उन्होने पतवार उठाई और दाहिने और डाली।  पतवार पाणी में डालने से उनका संतुलन बिघडने से दिवाणजी दायी नाव में गिरे। यह दृष्य बाबा स्नान करते-करते देख रहे थे तब बाबांने कहा, दिवाणजी आपको नाव चलाने नही आती तो नाव में क्यों गये। बाबांको लगा वह पाणी में डुबेंगे इसलिये उन्होने बुज गडीरामजी डोनारकर इस सेवक से पुछा की तुम्हे तैरना आता है क्या? उसने हामी भरते ही बाबाने उसे आदेश दिया की, तुम तैरते हुए जाओ और उस नाव की रस्सी खींचकर किनारे पर लाओ और बांधकर रखो। तदनुसार उन्होने वह नाव लाकर किनारे पर बांधकर रखी। बाबां का स्नान होने पर उन्होने सभी सेवकों से कहा। आप सब लोग जल्दी नहाकर भोजन के लिये आए। तब तक मैं मुकाम की जगह पर जाता हुँ। तद्नुसार बाबा जाने लगे। उस समय वे पैरो में पादका (चप्पल) पहनना भूल गये थे। वह तालाब के किनारे पर ही रह गई थी।

         बाबा वहाँ से गये इसलिये कुछ सेवकों ने बाँधकर रखी नाव की रस्सी खोली। कुछ सेवक नांव में बैठकर कपड़े धोने लगे। लोहारा इस गांव का सेवक श्री. शामरावजी कार, इसने उस नाव को जोर से लाथ मारी, जिससे वह नाव गहरे पानी में गई और इधर कार का पैर फटा। श्री. श्रीराम भंडारबोरडीवाला वह पुनः तैरते-तैरते उस नांव तक गये और नाव को पकडकर वह नाव में चढ़ते समय वह नांव एक और झुकी। उसी वक्त नाव में जो लोग थे वे पानी में फटाफट गिरे। नाव जब सीधी हुई तब उस जोडनाव में संपूर्ण पानी भर गया था। किनारे पर के १५-२० सेवक जोर से चिल्लाने लगे की नाव पानी में डुब गइ। यह आवाज खाना पकानेवाली महिलाओं तक पहुँची। वहाँ धर्मपुरी इस गाव की सौ. चंद्रभागाबाई यह सेविका थी। उसने ज़ोर से कहा, बाबा के रहते नाव नहीं डुब सकती। उस बाई में बाबा की कृपा बाबत कितना आत्मविश्वास था वह दिखता है। बाबा तब तक तीन चार सौ कदम चले आये थे। उनके भी कानों में चिल्लाने की आवाज आयी, उसी । समय उनके पांव में कंकर चुभने लगे, उनके ध्यान में आया की मैंने पैर में पादुका नह पहनी है और मैं वह तालाब के किनारे ही भुल गया हूँ। बाबांने मन में विचार किया की भगवंत, क्या किया इन सेवकोंने? बाबांके शब्दों पर अमल(पालन) न करने से इन सेवकों पर आपत्ती आई थी लेकीन उस स्थान पर बाबा की पादुका होने से उस संकट पर  मात हुई थी।

       बाबा पादुका पहनने के लिये वापस तालाब के किनारे आये और तालाबपर का  दृष्य उन्होने देखा। उस समय नागपूर के सेवक श्री. लक्ष्मणराव उराडे यह अकेले ही उस  जोड़नांव के दो-भाग में दोनो पैर रखकर खडे है। संपूर्ण नांव पाणी से भरी हई है फिर भी वह पाणी पर तैर रही है ऐसा दिखा। बाबां के पास में कुछ सेवक खडे थे. उन्हें कहा, यह आपने क्या किया? आप सेवको को बताने के बावजुद आप बाबांकी नहीं सुनते और ऐसी घटनाएँ आप लोग बाबां को दिखाते है। तब उन सेवकों ने बाबां को संपूर्ण हकीकत बयान की। तत्पश्चात् बाबांने संपूर्ण पुछताछ की, कितने सेवक नाव में थे ] कितने सेवक तैरकर बाहर निकले? और कितने अंदर डुबे है। पुछताछ के बाद पता चला की सब लोग बाहर निकले है, लेकीन गोपिचंद तुपट इस सेवक को तैरना नही आता था। इस लिये वह अंदर ही है। उसे निकालने के लिये संपत शेरकी पाणी में गया। संपत शेरकीने गोपीचन्द को किनारे पर लाया। बाबां के पास में मांदरी इस गांव का कचरू नामक सेवक खडा था। उसे बाबांने पुछा, तुम्हे तैरना आता है क्या? उसने हामी भरते ही बाबांने उसे आदेश दिया की पानीसे भरी नांव की रस्सी पकडकर किनारे पर लाओ। तदनुसार बाबांके आदेश का पालन कर उसने उस नाव को तैरते हुए किनारे पर लाया। उसके साथ ही श्री. उराडे भी किनारे पर आये। सब लोक बाहर आने पर बाबाने उन्हे पुछा की यह सब कैसे हुआ? उस पर उन्होने निम्नानुसार हकीकत सुनायी।

          प्रथम उराडे साहब ने कहा नाव पलटी होते ही मैं नाव को कसकर पकडे रहा। नाव में संपूर्ण पाणी भरने पर वह सीधी हुई। और मैं खडा हुआ। सोचा की मुझे तैरना नही आता इसलिये मैं कुद नही सकता। नाव में पूरा पाणी भरने से वह नाव डुबेगी अथात् दोनों  क्रियाओंमें मुझे मरना ही है। जीवित रह नही सकता। तब मैंने भगवंत से प्रार्थना की और कहा, "मरे या जिये भगवत् नामपर। बाबा हनुमानजी आप मुझे मारो या तारो में आपके शरण में हूँ।" ऐसी याचना कर रहा था।"जाको राखे साईयाँ मार सके ना कोय" इस  कहावत अनुसार वास्तविक रुप में भगवंत ने श्री. उराड़े को जीवनदान दिया। नाव पानी से भरकर भी डुबी नही। वह पानी में तैरने लगी। अर्थात भगवंत ने उस नाव को नीचे । से टेका दिया था। यह सिध्द होता है, और यह कितना बडा साक्षात्कार है की नाव में पानी भरने के बावजूद भी उसका न डुबना, धन्य हो आप भगवंत। नाव किनारे पर आने के बाद बाल्टी से उस नाव से पानी निकाला गया और रस्सी से किनारे पर बांधकर रखा गया।

         दुसरी घटना में श्री. संपत शेरकी बताते है की-गोपीचंद जिस और पानी में गिरा इसी ओर वह भी गिरा और उसे लाने का प्रयास किया। लेकीन गोपीचंद ने संपत को पानी में ही खीच लिया। जिससे उसे तैरने में दिक्कत होने लगी और उसे पानीपर हाथ मारना मुश्किल हुआ। तब उसके मन में आया की मैं अब डुबुंगा और यह भी डूबेगा इसलिए संपतने भगवंत को बिनती की, भगवान बाबा हनुमानजी आप मुझे इस परिस्थिती से बचाओ। मैं अब मरनेवाला हूँ। तब परमेश्वरने उस पर भी कृपा की। उसके दोनों हाथ खुले हुए और उसने अपने दोनो हाथ पानी में चलाये और वह उपर आया। हाथ पानी में मारते ही संपत के हाथ में गोपीचंद की धोती आयी। वह धोती पकडे तैरते-तैरते किनारे पर आया और उसने गोपीचंद को अपने साथ खिंचकर किनारे पर लाया। इस प्रकार सब लोग जिवीत एवं कुशलता पूर्वक तालाब के बाहर निकले। धन्य वह परमेश्वर! उस जगह बाबाके पादुका के रुप में भगवान खडे थे। उन्होने इन सब सेवकों कों उस बिकट परिस्थिती से मुक्त किया तत्पश्चात सभीने "भगवान बाबा हनुमानजी की जय। समर्थ बाबा जुमदेवजी की जय। परमात्मा एक। सत्य, मर्यादा, प्रेम कायम करनेवाले, अनेक बुरे व्यसन बंद करनेवाले मानव धर्म की जय।" ऐसा हर्षोल्लास से जयघोष किया। वन विभाग का चौकीदार भी उस समय वहाँ उपस्थित था। उसने कहा, इस तालाब में जो कुदता है वह उपर नही आता। वही मारता ही है। लेकीन आप सब लोग सही सलामत कैसे उपर आये? यह आपके गुरु आपके साथ रहने से उन्ही की महिमा है। यहाँ ढिवर मछली नही पकडते। वे डरते है लेकीन आपकी हिंमत और आपके गुरु ने दी हुई अनुमती इससे सचमुच भगवान आपके पास है यह प्रमाणित होता है। तत्पश्चात सब लोग भोजन की जगह आये। सभी ने भरपेट भोजन किया।

        सभी के खुशी का ठिकाना नही था। (सभी अति आनंदित थे।) सब लोगोंने बाबा से कहा, "बाबा आज हम इस परिस्थिती से नही बचते तो क्या हुआ होता ? कितनी बड़ी घटना घटी थी।" और सभी सेवक बाबा के समक्ष नतमस्तक हुए। तत्पश्चात सभी ने बाबांको शब्द दिया की, यह प्रसंग बाबांकी न सुनने के कारण उनके शब्दों का अनादर करने से घटित हुआ। इसके आगे भविष्य में बाबा के शब्द हमेशा अमल में लायेंगे। ऐसा सत्य वचन उन सभी ने दिया। बाबांने उन सभी को क्षमा किया। भोजन सम्पन्न होने पर सामान को समेट कर मंगरली इस गांव में शाम को सभी सेवक कुशलतापुर्वक वापस आये।

          उपरोक्त घटना से यह प्रमाणित होता है की, बाबा के रूप में परमेश्वर सदैव सर्वत्र होता है। सभी सेवकों ने उनके शब्दों का आदर करना चाहिये। परमेश्वर बाबांकी पादुका के रुप में भी उपस्थित होता है। बाबा परमेश्वर का रुप है यह"बसका बैल" अर्थात जानवर ने भी पहचाना।

नमस्कार..!

लिखने में कुछ गलती हुई हो तो में  "भगवान बाबा हनुमानजी"और "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" से क्षमा मांगता हूं।

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🔸 ऊपर लिखित आवरण "मानवधर्म परिचय" पुस्तक ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती से है।



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परमात्मा एक मानवधर्मात सेवकांनी दसरा सण कशाप्रकारे साजरा करावा.

  "परमात्मा एक" मानवधर्मात सेवकांनी दसरा सण कशाप्रकारे साजरा करावा.         !! भगवान बाबा हनुमानजी को प्रणाम !!       !! महानत्याग...