Wednesday, May 13, 2020

प्रकरण क्रमांक:- (१०) "चार तत्व"

                   "मानवधर्म परिचय"

"मानवधर्म परिचय पुस्तक" (हिंदी) सुधारित द्वितीय आवृत्ती

परमपूज्य परमात्मा एक सेवक मंडळ वर्धमान नगर, नागपूर

               "मानवधर्म परिचय पुस्तक"

                 प्रकरण क्रमांक (१०)

                        "चार तत्व"

                 
                 

प्रकरण क्रमांक:- (१०) "चार तत्व"


         महानत्यागी बाबा जुमदेवजी ने एक परमेश्वर की प्राप्ती के लिये विदेय अवस्था में रहते हुये अंत में एक परमेश्वरने बाबा को दर्शन दिये और उन्हें बेइमान कहा। तत्पश्चात बाबांने परमेश्वर को इमानदारी और निष्काम भावना से मानव को परेमश्वर के प्रति जगाने का कार्य करुँगा ऐसा वचन देकर "परमात्मा एक" "मरे या जिये भगवत नामपर" ऐसा वचन दिया। भगवंत बाबा पर प्रसन्न हुये और उन्होंने बाबांको अगले दो वचन दिये।"दुःखदारी दूर करते हुये उध्दार" और "इच्छा अनुसार भोजन" यही वचन इस मार्ग के सिध्दांत बनाकर बाबांने भगवत प्राप्ती के लिये निष्काम कर्मयोग साधने के लिये और मानव को जीवन में सफल होने के लिये यह चार तत्व दिये है।

৭. परमात्मा एक
२. मरे या जिये भगवत् नामपर
३. दुःखदारी दूर करते हुये उध्दार
४. इच्छा अनुसार भोजन


१. परमात्मा एक

  

    महानत्यागी बाबा जुमदेवजींने ऐसे एक परमेश्वर का, जो मानव के सभी तरह के दुख दूर कर सके, उसकी खोज करने का कार्य प्रारंभ किया। तब उस परमेश्वरने आकार में आकर दर्शन दिये।"तेरा है तेरे पास तो भी तू भूल गया" इस कथनानुसार उन्होने बाबा से कहा, "सेवक, तु मुझे कहाँ देख रहा है। में २४ घंटे तेरे पास हूँ। जिस पल छुट जाऊँगा, तेरा शरीर मृत हो जायेगा।" तब बाबाने विचार किया की ऐसी कौनसी वस्तु है जिसके कारण में जिंदा हूँ। तब उन्हें"आत्मा" यह वस्तु याद आयी। मनुष्य की आत्मा निकल जाने पर उसका शरीर मृत होता है। शरीर यह नश्वर है। आत्मा वह अमर होकर वह परमेश्वर का अंश है संपूर्ण प्राणियों की आत्मा मिलकर "एक परमात्मा" है। यानि परमेश्वर का अंश प्रत्येक जीवात्मा में है। यह बाबांने पहचाना। इसलिये बाबांने परमेश्वर को "परमात्मा एक" माना, वह आत्मज्योत है। जो आत्मा बाबांके पास है वही, आत्मा अन्यों के पास भी है। इसका अर्थ सभी मानव समान है। ऐसा बाबा मानते हैं। इसिलिए वे किसी को भी अपने पैर पर माथा टेकने नही देते। क्योंकी एक आत्मा के सामने दुसरा आत्मा झुकना, यह आत्मा का अनादर होकर पर्यायी परमेश्वरका अनादर है। इसलिये परमेश्वर यह व्यक्ती न होकर वह निरंतर चैतन्य शक्ती है। इसलिये परमेश्वर यह व्यक्ती न होकर शक्ती है, वह निराकार है। यह आकार में आती रही, फिर भी वह अदृष्य है। वह दिखाई नही देती। सिर्फ उसके गुण दिखते है।


२. मरे या जिये भगवत् नामपर

 

         मानव यह पृथ्वीतलपर पैदा हुआ। फिर भी वह परमात्मा का ही एक अंश है।  परमेश्वरने उसे बुध्टी दी और अन्य गुणों के साथ साथ उसमें मोह, माया, अहंकार निर्माण किया है। वह खुद को स्वयंभू समझता है वह परमेश्वर को नहीं मानता। इसलिये यह अपनी बुध्दि का उपयोग कर मोह, माया, आहंकार में फँसता है, जिससे वह दुःखी होता है। वह दुख निवारण करने के लिये कई तरह के उपचार करता है। लेकीन जब उसके दुःखख नष्ट नही होते, तब उसे परमेश्वर की याद आती है और वह उसकी आराधना करता है। इसलिये महानत्यागी बाबा जुमदेवजी हमेशा बताते है की, मनुष्य यह स्वयंभू नही है। परमेश्वर यह एक शक्ती है। मानव यह कर्मकर्ता है। वह फल की अपेक्षा न करे। फल देने बाला भगवान है। इसलिये मानवने जीवन रहते तक परमेश्वर के नाम का स्मरण करके उसके वसंदीदा कार्य करें। तब उसे मृत्यू आनेपर उसकी आत्मा परमेश्वर में विलीन होती है। अन्यथा वह चौरास्सी लाख योनी घूमते रहते है, वह आत्मा अशांत रहती है और ताख चौरारती भोग आते है। परमेश्वर को समक्ष रखकर मानव ने कार्य किया तो उसके शरीर से मोह, माया और अहंकार नष्ट होते है इसी को कहा गया है की, मरे या जिये भगवत नामपर।


३. दुःखदारी दूर करते हुये उथ्दार

   

      महानत्यागी बाबा जुमदेवजीने बताया है की, मानवने यदि परमेश्वर के पसंदीदा कार्य किये और मोह, माया तथा अहंकार का परित्याग किया, सब से सत्य व्यवहार किया, वह मर्यादा पूर्वक रहा और प्रेम का आचरण किया, तो वह मानव परमेश्वर को सदैव प्यारा रहता है। प्राकृतिक वातावरण से उसे दुःख होना तथा उसे जीवन जीते हुये
कई प्रकार के कष्ट आपदाएँ आती है। ऐसे समय वह कई उपचार करता है। उस समय परमेश्वर को समक्ष रखकर उपचार किया तो उसके दु ख जल्द ही नष्ट होते हैं और उसकी आपदाएँ सहजरूप से समाप्त होती है। इस कार्य में परमेश्वर उसका साथ देता है अंत समय में मानव की परमेश्वर मुक्ती देता है और उसे मोक्ष प्राप्त होता है। यानि मानव को परमेश्वर के चरणों में स्थान मिलता है इस प्रकार परमेश्वर मानव के दुःख दूर कर अंत में उसके जीवन का उध्दार करता है।


४. इच्छा अनुसार भोजन


     मानव जन्म लेनेपर उसे संपूर्ण जीवन जीने के लिये बहुत सी बातों की आवश्यकता होती है। वह अपना जीवन सुखी और समाधानी कैसे बनेगा इस ओर उसका अधिक ध्यान होता है तब उसने भगवंत के पास उसके चाहत की दस्तुओं की इच्छा की । और परमेश्वर को बिनती की तब उसे वह वस्तु सुगमता से प्राप्त होती है यही "इच्छा अनुसार भोजन" है, इच्छा अनुसार भोजन का अर्थ मानव को कभी भी, जब उसे जो। कुछ खाने की इच्छा हो और वह उसे मिलना चाहिये, ऐसे नहीं है। जैसे असेल माझा हरी तर देईल पलंगावरी यह गलत है। उसने जिस प्रकार के कार्य किये होगे। उसी प्रकार उसने इच्छा की तभी उसे वह वस्तु प्राप्त होती है, अन्यथा नही, यानि इच्छा अनुसार भोजन के लिये उसे तदनुसार कर्म करना महत्वपूर्ण है।

नमस्कार...!

लिखने में कुछ गलती हुई हो तो में  "भगवान बाबा हनुमानजी"और "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" से क्षमा मांगता हूं।


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Tuesday, May 12, 2020

प्रकरण क्रमांक:- (९) "एक भगवंत का पहला गुण"

                  "मानवधर्म परिचय"

"मानवधर्म परिचय" पुस्तक ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती

परमपूज्य परमात्मा एक सेवक मंडळ वर्धमान नगर, नागपूर

              "मानवधर्म परिचय"पुस्तक

                            प्रकरण क्रमांक (९)

                    "एक भगवंत का पहला गुण"

               

प्रकरण क्रमांक:- (९) "एक भगवंत का पहला गुण"


      बाबाने एक भगवंत की प्राप्ती की। उसके बाद वे करीब -करीब तीन माह तक विदेह अवस्था में थे। वे परमेश्वर में विलीन हुये थे। रंगारी समाज की शांताबाई के शरीर में आनेवाले भूत-पिशाच बहुत प्रयास करने पर भी बाबांने उसके शरीर में आने वाले भूत को समाप्त नही कर पाये। उसे समाधान दे न सके। आखिर बाबा हनुमानजी की प्राप्ती करने के बाद भी बाबा को उस बाई के शरीर से भूत निकालना साध्य नहीं हुआ। परमेश्वर मानव के किसी भी प्रकार के दुःख दूर कर सकता है। सद्भावना से उसी की शरण में जाना आवश्यक है। यह ध्यान में रखकर उस महिला को पूर्णतः समाधान देने के लिये बाबा हनुमानजी के पास प्रतिज्ञा की, की उसके बाद जीवन में मैं किसी भी देव (दैवत)
को नही मानुँगा। उसके पश्चात उस महिला शांताबाई को उसके दु.खो से बाबांने मुक्त किया। बाद में बाबाने वह दुःख दूर करनेवाली शक्ती की खोज करने की शुरुवात की और बाबांने एक भगवंत की प्राप्ती की ।

         उसी शांताबाई के घर में इन्ही तीन माह की कालावधी में बाबा निराकार अवस्था में होकर भी पुनः दुख आया। एक दिन इस महिला की सास बाबा के घर रोते-रोते अपना दुख लेकर आयी। बाबा घर में न होने के कारण वह बाबा के कनिष्ठ बंधु श्री. मारोतराव इनके यहाँ गयी और रोने लगी उस समय बाबा उनके जेष्ठ बंधु बाळकृष्णाजी के घर में बैठे थे। उसे रोते देखकर मारोतरावजी का मन पसीजा। वे बाबा को यह बताने गये और उन्होने बाबांको बिनती की की, "बाबा एक महिला रोते हुये आयी है। बहुत रो रही है। लगता है बहुत बड़े संकट में फंसी है आप चलिये।" तब बाबाने उन्हे कहा की, "ठीक है मैं आ रहा हूँ। तुम उस बाई को बगल में खड़े रखना ताकी उसकी छाँब हमपर न पडे।" कारण बाबा निराकार अवस्था में होने पर परमेश्वरने उन्हें ऐसी जागृती दी थी की "सेवक पर किसी भी महिला की छौँव न पड़े वरना वो जिंदा नही रहेगा।" तद्नुसार मारोतरावने उस स्त्री को बगल में खड़ा किया। बाबा घर आये और अपने आसन पर बैठे। 

          बाबा घर में आने पर उन्होंने महिला से पुछा की "कहो बाई आप कैसी आयी? क्यों रो रही हो? तब उस बाईने बाबा को बिनती की की, "बाबा आप जान लो में क्यो रो रही हूँ। आप बाबा है।" बाबा कुछ भी नही बोले। उस समय बाबा निराकार अवस्था में थे। वे परमेश्वर मे विलिन थे। इसलिए बाबा उस बाई की अवस्था जानते थे। कुछ समय के पश्चात बाबां के मुखकमल से निम्नानुसार वाक्य (वार्ता) निकले, बाबा ने कहाँ।
"नाथ गोरख, हाजिर हो जाओ।"
"हाजिर बाबा।"
জ जाओ, यमराज को बुलाकर लाओ।
"चला बाबा।"
तत्पश्चात दस मिनट वे स्तब्ध रहे, उसके बाद पुनः बाबाने कहा,
"यमराज आ गये।"
 "हाँ बाबा मैं आ गया"।
 "देखों यमराज, उस बच्चे के गले में फाँसा डाला है, उसे निकालो नहीं तो तेरे साथ तेरी यमपुरी उल्टी कर दूँगा।"
"नहीं बाबा, मैं अभी उस बच्चे के गले का फाँसा निकालता हूँ"।
"नही, तुम पहले जाओ, उसे निकालो, तू बेईमान है।"
"नहीं बाबा, आप मेरे साथ मेरी यमपुरी उलटी कर दोगे मुझपर विश्वास किजीये बाबा। मैं अभी फाँसा निकालता हूँ।
"तुम अभी जाओ और उसका फाँसा जल्दी निकालो।"
"चला बाबा"

       तत्पश्यात बाबा थोडी देर रुके, चारो ओर शांती थी। कुछ समय बाद बाबाने उस बाई से कहाँ। "बाई तुम्हारा बच्चा ऊठकर बैठा है। उसे अभी ले आओ।" उस महिला का रोना बंद हुआ। उसने बाबा को नगस्कार किया और वह हँसते हँसते घर गई। और आश्चर्य यह की, सच में उस शांताबाई का लडका उठकर बैठा था उसे बहुत समाधान हुआ। वह बाई उस लडके को (पोते को) लेकर बाबा के यहाँ आयी। दूर से ही उसने बाबा के दर्शन किये। इस प्रकार एक परमेश्वरने उस बच्चे को मौत के मुँह से बाहर निकाला। यह पहला अनुभव इस एक परमेश्वर ने प्रथम उस घर में ही दिया। इसी तरह बाबांने केवल पिडीत और दुःखी लोगों के दुःख दूर करने के लिये एक भगवंत की प्राप्ती की।

नमस्कार...!


लिखने में कुछ गलती हुई हो तो में  "भगवान बाबा हनुमानजी"और "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" से क्षमा मांगता हूं।


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Monday, May 11, 2020

प्रकरण क्रमांक:- (८) "विदेहावस्था"

                    "मानवधर्म परिचय"


"मानवधर्म परिचय" पुस्तक ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती

परमपुज्य परमात्मा एक सेवक मंडळ वर्धमान नगर, नागपूर

                       "मानवधर्म परिचय" पुस्तक

                  प्रकरण क्रमांक (८)

                     " विदेहावस्था"

                  

प्रकरण क्रमांक:- (८) "विदेहावस्था"


          महानत्यागी बाबा जुमदेवजीने एक भगवंत की प्राप्ति श्रावण वद्य पष्ठी दि. २५/८/१९४८ दिन बुधवार को की। तब से वे निराकार अवस्था में ही थे। उन्हें विदेहास्थिती प्राप्त हुई थी। वे पूर्णतः परमेश्वर में विलीन हुये थे। बाबा की यह स्थिती देखकर उनके परिवार के अन्य लोग चिंताग्रस्त हुये। उन्होने आपस में विचार किया की इस स्थिती बाबत परमेश्वर को बिनती करके बाबाकों मुक्त कराये तदनुसार वे सभी लोग एक भगवत् प्राप्ति के दुसरे दिन बाबा के यहां आये तब बाबा निराकार अवस्था में ही थे और परमेश्वर में विलीन हये थे।

  

     परिवार के लोगों ने बाबा से बिनती की, की "हे भगवान सेवक की यह स्थिती कब तक रहेगी? आप सेवक को इस स्थिती से मुक्त किजीए" तब परमेश्वर रुपी बाबाने उत्तर दिया की,"अगर आपका भाई आपको इतना प्यारा था, आपको उससे इतनी हमदर्दी थी तो आपने उसे भगवान की सेवा करने क्यों लगाई? उस समय आपने उन्हे रोकना था। अब सेवक भगवान का हो गया, न की किसी का रहा और भगवान सेवक का हो गया है। मेरा सर सेवक का धड और सेवक का सर मेरा धड ऐसा विलीन हो गया है। इस तरह दोनों की आत्मा एक हो गई है।"
 

      भगवंतने बाबा के मुखकमल से पुनः घर के लोगों को संबोधित शब्द निकाले की, "सेवक भगवान बन गया। इसलिए सेवक एक ही समय थोडासा साधा भोजन करेंगे। जिसमें दाल, चावल, सब्जी और घी होगा। और कोई भी महिला धर की हो या बाहर की, उसकी छाँव सेवक पर न पड़े। नही तो सेवक कही का नही रहेगा। जिंदा नहीं रहेगा।" इस प्रकार भगवंतने सेवक को (बाबा कों) दैवी शक्ती की जागृती दी, जिसे आज समाज मेंबहुत से लोग मानते है।
  

        इसी दिन से बाबा की जेष्ठ भाभी श्रीमती सीताबाई इनके शरीर में शनिवार को जो पार्वती आती थी। वह उनके शरीर में आने की क्रिया बंद हुई। बाबा के परिवार में परमेश्वर की (हनुमानजी) प्राप्ती करने के बाद भी जो दुःख आते थे। वह भी इसी दिन से नष्ट हुये। बाबा के परिवार में जो अनेक दैवत माने जाते थे, वह मानना बंद हुआ। इसके अलावा उनके घर की समस्त भुतबाधाएँ भी नष्ट हुई।
    

        परमेश्वर प्राप्ती से पहले बाबा के परिवार में घर के लोग परंपरानुसार अंधश्रध्दा के कारण कुछ त्योहार नही मानते थे उनमें से पोला यह एक त्यौहार था। बाबांने एक भगवंत की प्राप्ती करने के बाद जल्दी ही आठ दिनमें पोला त्यौहार आया। उसके दो दिन पहले बाबा निराकार में आये और घर के लोगों को उस निराकार बैठक में आदेश दिया की इस वर्ष पोला यह त्यौहार घर के सब लोगों ने मनाना चाहिए , तद्नुसार पोला मनाने का सुनिश्चित किया ।
    

      श्रावण अमावस्या आयी , पोले का दिन निकला उस दिन सबेरे ही बाबा के मकान के दरवाजे में एक बड़ा अजगर वलय ( कुंडली ) बनाकर दरवाजे की आड में ,  छुप कर बैठा था । वह किसी भी आने वालों कों दिखता नहीं था । वह किसी को भी काटने का प्रयास भी नही करता था । वह साप किसी को भी नहीं दिखा । उस वक्त बाबा दरवाजे में जाने पर उनका ध्यान उस ओर गया । वह सिर उपर निकालकर शांत था । कोई भी हलचल नही करता था , यह बाबाने देखा । इस समय भी बाबा विदेह स्थिती में ही थे। तत्पश्चात बाबांने स्वयं ही एक छोटी सी लकडी से उसके सिरपर मारा । उस सादे मार से ही साप मर गया । इतना बड़ा अजगर और कुछ भी हलचल न करते हुए वह सादे मार से मरता है यह देखकर बाबा आश्चर्यचकीत हुए । उन्होने बहुत विचार किया तब वे बोले , इतने लंबे समय से इस घर में जो दुःख थे । उसका असली जिम्मेदार यह साप था , कोई तो भी मरने के पश्चात् उसे मोक्ष प्राप्त नही हुआ , इस कारण वह साप के रुप में भूत था । एक परमेश्वर की प्राप्ती के बाद इस घर में चोबीस घंटे जागृत रहनेवाली शक्ती चैतन्यरुप में विचरण कर रही है । इसलिए वह यहाँ रह नही पाया और उस शक्ती के हाथों उसे मोक्ष चाहिए था । तद्नुसार उसे परमेश्वर रुपी बाबाकें हाथो मोक्ष प्राप्त हुआ तब से आजतक उनके घर में किसी को भी भूतबाधा नहीं हुई। बाबा आज जिस घर में वास्तव्य कर रहे है उस घर में चारों और से प्रसन्नता है। वहाँ उल्हासमय वातावरण है क्योंकी वहां चोबीस घंटे जागृत शक्ती चैतन्य रुप में विचरित है । तब से उनके घर में सुख शांति प्राप्त है।
   

        कोई भी त्योहार न माने, किसी भी देव को न माने, एकही परमेश्वर की आराधना करे, यह यदि निश्चित हुआ था। तो भी विधिलिखीत कुछ होना है। इस कथ्य अनुसार परमेश्वर को कुछ तो भी घटित करना था इसलिए उन्होने पोला त्यौहार के निमित्य कर उस घर से संकट का मूल हमेशा के लिए नष्ट किया।
    

      बाबा विदेह अवस्थामें होने पर रात दिन विश्व में बृहद विशाल एक ही नेत्र(आँख) दिखता था। इसलिए वे बहुत घबराये थे। उस एक ही आँख को देखने की उन्हें हिंमत नही होती थी। इसलिए उन्होने उनके जेष्ठ बंधु श्री. बाळकृष्ण इन्हें बताया की, "भैया, मैं तेरे घर आकर तेरे पास सोऊँगा। मुझे इस घर पर विशाल एक ही आँख दिखाई देती है। वह देखकर मुझे डर लगता है। इसलिये वह मैं देख नही सकता।" इतना विशाल एकही नेत्र बाबाको एक-सव्वा महिने तक लगातार दिख रहा था।
    

          बाबाने अपने जेष्ठ बंधु को बताये अनुसार वे उनके यहाँ जाकर सोने लगे। श्री. बाळकृष्णजी का मकान बाबा के सामने ही है। बाबा वहाँ भी नींद से जाग जाते थे। और उन्हे बाबा हनुमानजी की बहुत बड़ी आकृती दिखती थी। तब बाबा भाई को नींद से उठाते और बताते की, "तुम बाबा हुनुमानजी को बताओं की तुम मेरे भाई के पीछे मत पड़ो, आप मंदिर में जाकर रहो।" तद्नुसार बाळकृष्णजी उतनी रात को ही हाथपॉव धोकर भगवंत के नाम से कपूर लगाते और बिनती करते थे की, "हे भगवान में आपसे बिनती करता हूँ की आप मेरे भाई के पीछे मत पडो । उसक परिवार है , उसका प्रपंच ( संसार ) है । इसलिए उसे आजाद करे" ।  ऐसी बिनती कर फिर सो जाते ।
     

         बाबांको एक ही आँख दिखना , बाबा हनुमानजी की प्रतिमा दिखना , इन लक्षणों से यह सिध्द होता है की , बाबा परमेश्वर में विलीन हुये है । क्योंकी भगवत प्राप्ती के लिये प्रारंभ में बाबांने जो प्रतिज्ञा की थी की , एक तो मरूँगा या भगवंत को प्राप्त करूंगा , लेकीन पिछे नही हटूंगा । तद्नुसार उनकी इच्छा पूर्ण हुई थी । परमेश्वर को प्राप्त कर वे उसमें विलीन हुये थे ।
    

          बाबा की यह विदेह अवस्था करीब - करीब तीन महिने थी । इस विदेह अवस्था में  एक दिन बाबांने अपने परिवारजनों को निराकार बैठक में मार्गदर्शन किया की , " घरवालो सुनो , आप सब लोग तीन माहतक भगवान से बिनती करो की हमारे भाई की यह अवस्था समाप्त कर उसे गृहस्थी में रखे" । उसके अनुसार घर के सभी लोगों ने रोज सबेरे सूर्योदय के पुर्व तीन माह तक एक भगवंत के नाम से अगरबत्ती व कपूर लगाकर उपरोक्तानुसार बिनती की । तीन माह पूर्ण होने पर दूसरे दिन हवन कर उसकी समाप्ती की और तत्पश्चात उसी दिन बाबा होशोहवास में आये । उनकी विदेह अवस्था समाप्त हुई । उन्हे सर्वसाधारण गृहस्थ जैसा सभी समझने लगे और इसी के साथ उनका अज्ञातवास भी समाप्त हुआ । वे परमेश्वर की ( हनुमानजी ) प्राप्ती करने के बाद यानि जनवरी १९४६ से करीब - करीब तीन वर्ष अज्ञातवास में थे । क्योंकी यह १९४८ साल का नवम्बर माह का दिन था । बाबा दुसरे दिन से अपने परिवार के निर्वाह के उद्योग करने लगे । इस प्रकार बाबांके परिवार में शांती मिली । बाबांने अपनी उम्र के अठ्ठाविसवे वर्ष एक भगवंत की प्राप्ती की । बाबा के बारें में लोगों को जैसे - जैसे , धीरे - धीरे मालूम होने लगा वैसे - वैसे लोग इस मार्ग में आने लगे सेवक बनने लगे । इस प्रकार सद्गुरु समर्थ बाबा जुमदेवजी इस नाम से प्रसिध्द हुये । आगे उन्हें ५ अगस्त १९८४ को इस मार्ग के सेवकोने महानत्यागी यह उपाधी प्रदान की और उन्हे सदगुरु समर्थ के बदले महानत्यागी बाबा जुमदेवजी कहने लगे ।

 नमस्कार..!
 

लिखने में कुछ गलती हुई हो तो में  "भगवान बाबा हनुमानजी"और "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" से क्षमा मांगता हूं।


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Saturday, May 9, 2020

प्रकरण क्रमांक:- (७) "एक भगवंत की प्राप्ती"

                 "मानवधर्म परिचय"

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                प्रकरण क्रमांक (७)

              "एक भगवंत की प्राप्ती"


प्रकरण क्रमांक:- (७) "एक भगवंत की प्राप्ती"

       

        पिछले प्रकरण में दर्शायें अनुसार बाबा जुमदेवर्जीने वाबा हनुमानजी कों बिनती करने पर प्रतिज्ञा की, मैं आज से किसी भी देवता को नहीं मानूँगा। यह बतानेपर बाबांने उस दर्जी समाज की महिला का संपूर्ण दुःख दूर किया। तत्पश्यात बाबां सोचने लगे की इसी हुनुमानजी के मंत्रोच्चार से उस स्त्री का दुःख दूर हुआ, लेकीन जो उसी मंत्र से प्रतिज्ञा के पूर्व नहीं हुआ।


        बाबानें प्रतिज्ञा किये अनुसार उस शक्ती का संशोधन करना प्रारंभ किया। उन्होने हनुमानजी के समक्ष प्रश्न रखा कि, "हे हनुमानजी संसार में ऐसी कौनसी शक्ती है, जो शैतान को एक पल में निकाल सके। भूत किसे कहे और भगवान किसे कहे। इसका स्पष्टीकरण हमें समझा दो।" इस समय बाबा स्वयं निराकार में आये और परमेश्वरी (बाबा हनुमानजी) बाबां के मुखकमल से ऐसे शब्द निकले की, वह एक ही परमेश्वर है, जिसने इस सृष्टि का निर्माण किया है। "वह एक जागृत शक्ती है जो निराकार है। वह चोबीस घंटे चैतन्य है। उसे प्राप्त करने के लिए पांच दिन हवन करना पडेगा।" तत्पश्चात कुछ देर में बाबाने उस निराकार अवस्था में ही घरके लोगों को संबोधित किया की "परिवार के लोग सुनों, हम कलसे पांच दिन हवन करेंगे।"


          निश्चितीनुसार दुसरे दिन से बाबानें पांच हवन को प्रारंभ किया। रोज एक इस प्रकार सायंकाल में शुरुवात की। इस दिन श्रावण वद्य प्रतिपदा थी और वह शुक्रवार था। इस दिन की तारीख २० अगस्त १९४७ थी। पांचवे दिन हवन समाप्त होते ही। बाबा का ब्रम्हांड चढ़ा। वह देहमान भूल गये और निराकार अवस्था में आये। इस अवस्था में वे बहुत बहुत आक्रांत कर रोने लगे तब परिवार के सभी लोग उपस्थित थे उस निराकार अवस्था में बाबा के मुखकमल से शब्द बाहर आये की, "मैं कहाँ आ गया हूँ।" ऐसा कहकर फिरसे जोर-जोर से आक्रांत कर रोने लगे। घर के लोगों को संबोधित कर बोले, "घरवाले सुनो, मैं कहाँ आ गया हूँ। सेवक भगवान बन गया।" यह सुनकर और बाबा को रोते देखकर घर के लोग घबराये और उन्हें "बाबा चुप हो जाओ" ऐसे मनाने लगे। लेकीन बाबा निराकार अवस्था में होने से उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं था। "मैं कहाँ आ गया हूँ।" ऐसा कहते बाबा लगातार एक से हेढ घंटे तक आक्रांत कर रोते रहे। तत्पश्चात वे शांत हुए, निराकार अवस्था से वे देहभान अवस्था में आये। उसके बाद उन्होने खाना खाया और विश्राम किया। लेकीन वे सुस्ती में ही थे।


          दुसरे दिन यानि छैंटवे दिन श्रावण वद्य षष्ठी थी। उस दिन १९४८ साल के अगस्त माह की २५ तारीख दिन बुधवार था। इस दिन बाबा सुर्ती में ही होने से हवन की समाप्ती समझकर घर के लोगों ने हवन किया। हवन समाप्त होते ही पुनः बाबा का शरीर घुमने लगा। वे देहभान भूल गये। उनका ब्रम्हांड चढा और वे निराकार स्थिती में आये कुछ समय बाद उनके मुखकमल से शब्द बाहर निकले की इस देश में जितने देवतां को मानते है। उदा. हिन्दु धर्म के राम, कृष्ण, शंकरजी, सभी देवियों, देवता, ब्रम्हा, विष्णु, महेश दत्त, सभी अवलिया उदा. गजानन महाराज, साईबाबा, उसी प्रकार अन्य धर्मों के दैवत जैसे अल्ला, येशु ख्रिस्त, महावीर जैन, बुध्द इत्यादि से सब उन्हें एक के बाद एक आकर दर्शन दे रहे है। ऐसे वे निशंतर बडबडाते रहे। तत्पश्चात विश्व के समस्त देव उनके शरीर में एक के बाद एक आकर उन्हें अपना-अपना परिचय देने लगे। इनमें शेषनांग ने भी अपना परिचय दिया। यह क्रिया बहुत देर तक चालू थी।


        यह संपूर्ण क्रिया पूरी होने पर उनके शरीर में अंत में एक भगवान आये। उन्होंने अपना परिचय दिया। इस समय बाबा के मुखकमल से ऐसे उदगार निकले की, "मैं सबका भगवान हूँ? सेवक, तू मुझे कहाँ ढूँढ रहा है। मैं चोबीस घंटे तेरे पास हूँ। जो क्षण मे तुझसे छुट जाऊंगा, तेरा शरीर मृत हो जायेगा " तब बाबा को लगा की, "मैं कितना पागल हूँ। भगवान मेरे पास होंकर में उसे ढूँढ रहा हूँ।" यह सारे शब्द बाबा के कानोंपर पड़ते थे। वे देहभान में थे। फिर भी उन्हें वह समझ में आता था।
 

       कुछ समय पश्चात् इसी निराकार अवस्था में रहते हुए एक पल में उनके ही मुखकमल से पुनः ऐसे शब्द निकले की," सेवक मैं भगवान हूँ। तू मानव है। मैं जानता हूँ, मानव यह बेइमान है उनमें से तू एक मानव है भलेही तूने मुझे प्राप्त किया, मैं भगवान हूँ। मैं मानवपर कदापि विश्वास नही करता"। यह शब्द बाबा के कानों में पड़े, तब वे निराकार अवस्थामें ही विचारमग्न हुए। उन्होने बहुत देरतक विचार किया और उसका जवाब वे हुँढने लगे। कुछ समय बाद उन्हे उत्तर मिल गया की इसका जवाब "इमान" यही है। और इमान ही भगवान है ऐसा समझ उन्होंने भगवान के पास प्रतिज्ञा की, की "हे भगवान में जीवन में इमान रखुँगा और सत्य सेवा करुँगा। ऐसा आपको सत्य वचन देता| हूँ।" इसके बाद फिर से विचार किया की, चोबीस घंटे मानव के पास रहुनेवाली ऐसी कौनसी शक्तीं है जो समाप्त होने पर शरीर मृत होता है। इस पर विचार करने पर उन्हें आत्मा यह शक्ती याद आयी। इसलिए पुनः उनके मुखकमल मे से ऐसे शब्द निकले की "परमात्मा एक! मरे या जिये भगवत् नामपर।" यह बाबा के वचन थे, जो उन्होने एक परमेश्वर को दिये। पुनः कुछ समय बाद बाबां के ही मुखकमल से ऐसे शब्द बाहर निकले "दुःखदारी दूर करते हुये उध्दार। इच्छा अनुसार भोजन"। यह दो वचन परमेश्वरने बाबा को दिये ऐसा उन्हे लगा।
        

      कुछ देर शांत रहकर उस निराकार अवस्थामें ही उन्होने परिवार के लोगो को संबोधित किया की, "परिवार के लोग सुनो, इस परिवार के लोग सभी पुजा बंद करके एक ही भगवान को माने।" ऐसा उन्होने आदेश दिया। तत्पश्चात परिवार के लोगों ने बाबा को आश्वासन दिया की,"बाबा आज से हम एक ही भगवान को मानेंगे"। तत्पश्चात बाबांकी निराकार (ब्रम्हांड) अवस्था समाप्त हुई। परंतु वे निराकार स्थिती में ही थे तब से घर के लोग एक ही भगवान को मानने लगे। सभी देवताओं की पुजा करना उन्होंने बंद किया। उन्होंने मंदिर जाना बंद किया।
    

       इस प्रकार बाबा ने "एक भगवान की प्राप्ती" की वह दिन श्रावण वद्य षष्टी होने के कारण प्रत्येक वर्ष इस दिनको समस्त सेवक "एक भगवंत का प्रगट दिन" के रूप में अपने अपने घर हवन कार्य कर वह दिन मनाते है। इसके अलावा मानव धर्म का वह सबसे बडा त्यौहार है ऐसा समझा जाता है।
    

       उस दिन से बाबा जुमदेवजी को बाबा हुनुमानजीने सही माईने एक परमेश्वर का परिचय कर दिया। तब से बाबा जुमदेवजी बाबा हनुमानजी को भगवंत न मानते अपना गुरु मानने लगे। सृष्टि निर्माता परमेश्वर के प्रतिक के रूप में कोई भी निशान नही है। किसी भी धर्म के अनुसार परमेश्वर का कुछ तो प्रतिक होना आवश्यक है। हिन्दू धर्मानुसार गुरुकी पुजा करना यानि भगवंत की पुजा करना है, ऐसा समझा जाता है। बाबा जुमदेवजी यह हिन्दु धर्म के होने से उन्होने अपने गुरु बाबा हनुमानजी इनका प्रतिक एकही भगवान के रुप में लोगों के समक्ष रखा है। भगवंत व्यक्ती न होकर वह चैतन्य शक्ती है। वह चोबीस घंटे जागृत होकर निराकार है। बाबा हनुमानजी यह भगवंत नही ऐसा स्पष्ट किया। इस मार्ग में हवन को महत्व है। मानव का ध्यान भगवंत की ओर रहना चाहिए इसलिए हवन करते समय अथवा हर दिन पुजा करते समय बाबा हुनुमानजी का प्रतिक रखा है। जिस कारण मानव के मन में भगवंत के विषय में जागृती निर्माण होगी और मानव सदैव भगवंत का मनन चिंतन करता रहेगा।
     

         बाबा हनुमानजीने बाबा जुमदेवजी को अनेक देव देवताओं का परिचय करा दिया। यह हमने उपर देखा है। उन सभीने इस पृथ्वीपर जन्म लिया है। उन्होने भगवंत के प्रिय पसंदीदा कार्य किये है, इसलिए वे "परमेश्वर" इस नाम से विख्यात हुए और इस दुनिया की भोली जनताने उन्हे परमेश्वर मानकर पुजा करने लगे। लेकीन वे परमेश्वर नही थे। उन्हें परमेश्वर समझ पुजा न करे क्योंकी परमेश्वर यहाँ एक ही है। जो सृष्टि का निर्माता और विश्व का विधाता है।

नमस्कार....!


लिखने में कुछ गलती हुई हो तो में  "भगवान बाबा हनुमानजी"और "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" से क्षमा मांगता हूं।


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ऊपर लिखित आवरण "मानवधर्म परिचय" पुस्तक ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती से है।



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Thursday, May 7, 2020

प्रकरण क्रमांक:- (६ ) "एक भगवत की प्राप्ति का मार्ग"


                "मानवधर्म परिचय"

"मानवधर्म परिचय" पुस्तक ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती से है।

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                  प्रकरण क्रमांक (६)

        "एक भगवत की प्राप्ति का मार्ग"


प्रकरण क्रमांक:- (६ ) "एक भगवत की प्राप्ति का मार्ग"


       बाबानें‌ भगवान बाबा हनुमानजी की प्राप्ति करने पर भी उनके परिवार के लोग हिन्दू धर्म के सभी देवों को उदा. राम, कृष्ण, शंकर-पार्वती, देवी इ. मानते थे। उनकी पूजा - अर्चना करते थे। जिससे उनके परिवार का दुःख पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ था। परिवार में दुःख आने से बाबा मंत्रोच्चार से फुंक मारते थे। मंत्रोच्चार से तीर्थ करके देते और दुःख दूर करते थे। लेकिन वह थोड़े समय के लिए ही होता था।
     

      अन्य लोगों को यह मालूम होने पर वे दुखी त्रस्त लोग बाबांकी ओर आने लगे। बाबा मंत्रोच्चार से फुंक मार कर उनके दुःख दूर करने लगे। बाबा यह विधी करनेवाले होने पर भी उन्हें इसमें से कुछ भी नहीं समझता था, वे अज्ञातवास में थे। लेकिन उनके मंत्र से लोगो को भगवंत के गुण मिलते थे।
  

      एक दिन रंगारी समाज की शांताबाई नामक स्त्री अपना दुःख लेकर बाबा के पास आयी। वह कैलास टॉकीज के पीछे रहती थी। उसके शरीर में बहुत भूत आते थे। बाबा जुमदेवजी बाबा हनुमानजी का नाम लेकर हाथ में झाड़ू लेकर उसे मंत्रोच्चार से उसके सिर पर मारते थे। मगर वह मार उसे नहीं लगता था। उसके शरीर में आने वाले भूत पिशाच नहीं निकलते थे। यह पिशाच निकालने की क्रिया निरंतर ढाई ( २ १/२ ) वर्ष शुरू थी। अन्य लोगो को केवल भगवंत के गुण मिलते थे। मगर केवल उसे नहीं मिलते था। उसके शरीर में इतने जोरदार पिशाच आते थे की, इस दरम्यान स्वयं के ही गालों का मांस अपने ही हाथो के नाखूनों से खरोचती और खाती थी। इतनी बेहोश अवस्था में वह थी। उसके गालों पर बहुत बड़ा जख्म हुआ था। बाबा सोच में पड़ गए की, हनुमानजी इस कल्पनारूपी शक्ति पर मात क्यों नहीं करते। उन्होंने बयालीस दिन हवन करने का निश्चय किया। जिससे उसे आराम मिलेगा ।   निश्चयानुसार दूसरे दिन से बाबा ने अपने घर में ही सायंकाल में एक निश्चित समय पर बयालीस दिन के हवन कार्य के लिए शुरुवात की। वह १९४८ का जुलाई माह था। वह बाई रोज हवन के लिए आकर बैठती। उसे इन बयालीस दिन के हवन में रोज कुछ दिखता रहता , उसी प्रकार वह लगातार बड़बड़ करती थी।
  

       हवन कार्य शुरू रहते वह ऐसा उल्लेख करती की यह हवन झूठा है। लेकिन कृष्ण भगवान हवन में खड़े है। वे आसमान को टिके हैं। बाबा हनुमानजी पाताल में घूम रहे है। और भूतो को खोज कर अपनी पूंछ में लपेट कर दस हजार , बीस हजार, चालीस हजार, सत्तर हजार, एक लाख इतने भूत लाकर वे हवन में डाल रहे है। जैसे - जैसे हवन के बयालीस दिन पूर्ण हो रहे थे। भूतो की संख्या बढ़ती ही जाती। बाबा हनुमानजी पूछ में एक लाख , दो लाख , पचास लाख भूतों को लाकर हवन में डाल रहे है। और वे हवन में जल रहे है। अखिरिट आखिरी में तो भूतों की करोड़ों और अरबों में गिनती करनेलगी और हवन में डालने के बारे कहने लगीं। तब बाबा ने मन में इतने शैतान कहां से आये? बाबा को लगा की जितने लोग मरते है। वह सब भूत - शैतान बनते है। उन्हें मुक्ति नहीं मिलती इसलिए मुक्ति पाने के लिए परमेश्वरी कार्य करना महत्वपूर्ण है, इस प्रकार बाबा ने बयालीस दिन हवन विधी कर उस स्त्री के शरीर में आने वाले भूत- पिशाच निकाले। इस दौरान हवन की राख ( अंगारा ) से उसके गालों की जख्म पूरी भर गई। और मांस निकालने की क्रिया बंद हुई।


      "भगवान की लीला निराली" इस कहावत के अनुसार उस महिला के शरीर में पुरी तरह भूत आना बंद नही हुआ था । वह पुनः दुसरे दिन यानि त्रैयालिस वे दिन प्रातः छ: बजे बाबा के घर आयी और अपना शरीर घुमाने लगी । बाबा उसी समय प्रातः विधी से निवृत्त होकर बैठे थे । उन्होने हवन का अंगारा लिया और मंत्रोव्दारा फुक मारकर उसके शरीर में आने वाले भूत को बाहर निकाला । समाधान मिलने पर वह घर जाने के लिए निकली । लेकीन आधे रास्ते से ही वापस बाबा के यहाँ आयी पुनः शरीर घुमाने लगी । बाबाने मंत्रोच्चार से उपचार किया और शरीर घुमाना बंद किया । वह होश में आकर घर जाने लगी आधे रास्ते तक जाकर फिर वापस बाबा के यहाँ आती और शरीर घुमाती । बाबा उपचार करके उसे होश में लाते । ऐसा दिन भर शुरु था । बाबाने मंत्रोच्चार से सारा दिन उसके शरीर से भूत निकालकर उसे होश में लाने का प्रयास किया । लेकीन वे उसे पूर्णतः समाधान नहीं दे सके । 


       उस दिन बाबाने स्नान नही किया । सारा दिन खाना नही खाये और उसके शरीर से भूत नष्ट करने में ही सारा समय व्यतीत किया । जी - तोड कोशिश की । लेकीन भूत निकला नही । उसे समाधान नही मिला था । शाम तक प्रयास चालू थे। दिनभर बाबांने संघर्ष कर के वे त्रस्त हुए थे। शाम को वह पुनः आने पर बाबा विचार करने लगे की बाबा हनुमानजी की शक्ति  के सामने यह कल्पनारुपी शक्ती टिकी हुई है। इसका यही अर्थ है की, हनुमानजी, राम, शंकर, देवी इनमें इस कल्पनारूपी शक्ति को नष्ट करने का सामर्थ्य नहीं है। तब बाबा ने हनुमानजी को बिनती की, की "हे हनुमानजी, आपने सारे दैवत की पहचान कराई और इस औरत का एक शैतान नही निकाल सकते। हे हनुमानजी, आप मुझे बताओं, ऐसी कौन सी शक्ति है जो एक पलमे इसे निकालेगा। मैं इसके बाद किसी भी देवता को नहीं मानूंगा"। ऐसी बाबा ने प्रतिज्ञा की और वे उस बाई से बोले, यह आखरी फुंक है बाई। इसके बाद नहीं आना।इतना कहकर अंगारा लेकर उसके शरीर पर मंत्रोच्चार से फुंक मारी तब उसके शरीर का भू निकला तथा वह जो घर गई तो पुनः वापस नहीं आयी। इस प्रकार उसके शरीर से भूत नष्ट हुआ और उसे समाधान मिला।


     यह देखकर बाबा को आश्चर्य हुआ और उसका ध्यान उन्होंने की हुई प्रतिज्ञा की ओर गया । उन्हें लगा कि वह कौन सी शक्ति हैं जिससे उस बाई के शरीर का भूत नष्ट किया । तद्नुसार उन्होंने उस शक्ति को खोज पाने का निश्चय किया। इस प्रकार बाबा को एक भगवंत प्राप्ति का मार्ग मिला।

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Tuesday, May 5, 2020

प्रकरण क्रमांक:- (५) "समय की महत्ता"


            "मानवधर्म परिचय"

"मानवधर्म परिचय पुस्तक" ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती से है।

परमपूज्य परमात्मा एक सेवक मंडळ वर्धमान नगर, नागपूर

                       प्रकरण क्रमांक (५)

             "समय की महत्ता"


 प्रकरण क्रमांक:- (५) "समय की महत्ता"

      बाबा ने परमेश्वरी कृपा प्राप्त करने पर भी उनके परिवार के लोग हिंदू धर्म में प्रचलित सभी देवों कों मानते थे। उनकी पूजा करते थे। सभी त्योहार मनाते थे, एकादशी, चतुर्थी इन दिनो में उपवास करते थे।

           श्री. बाळकृष्ण एवं नारायणराव इनके घर ग्यारह दिन के हवन कार्यक्रम के दौरान भारतीय संवत् पौष माह शुरु था। इस हवन की कालावधी में ही वद्य चतुर्थी आयी थी वह १९४६ के जनवरी माह की बीस तारीख, रविवार दिन था। यह चतुर्थी हिन्दुओं में प्रमुख चतुर्थीयों में से एक मानी जाती है। वैदिक दृष्टीसे इस दिन का बडा महत्व है ऐसा समझा जाता है। इस दिन बाबा के परिवार की महिलाओं को उपवास था। हवन समाप्त होते-होते रात में बहुत देर हो जाती थी। सामान्यतः ग्यारह बजते थे। इसलिए घर के पुरुष मंडलीने बाबा से बिनती की, की आज स्त्रियों को निर्जला उपवास है और रात के
ग्यारह बजे हवन समाप्त होगा। जिससे उन्हे भोजन करने में बहुत देरी होगी। इसलिए हमारी ऐसी बिनती है की, पहले भोजन करके फिर हवन में जाये इससे स्त्रियों को परेशानी नही होगी। बाबांने उनका कथन शांततापुर्वक सुन लिया एवं स्वयंही ऐसा विचार किया की भगवान की पूजा बाद में भी की, तो क्या फर्क पडेगा। परमेश्वर को पसंदीदा कार्य करना यही सच्ची परमेश्वर की आराधना है। ऐसा मन में सोचकर उनकी बिनंती को उन्होने अनुमती दी। सायंकाल में भोजन समाप्ती के पश्चात हवन कार्य करने वे अपने जेष्ठ बंधु के यहाँ गये। उन्हे हवन प्रारंभ करने में वस्तुतः बहुत देर हुई थी।

          हवन समाप्त कर बाबा घर आये। बाबा का आराम करने का एक अलग ही १६ X३० का कमरा था। उस कमरे में बाबा अकेले सोते थे। हमेशा की तरह बाबा मन में कुछ भी विचार न लाते कमरे का व्दार बंद कर के सो गये। सामान्यतः अर्ध रात्री पश्चात एक- दो बजे के आसपास बाबा चोर-चोर कहकर जोर जोर से चिल्लाने लगे। उनकी आवाज सुनकर पास ही कमरे में सोनेवाले लोगों की नींद खुली सभी पुरुष लोग जाग गये। वे बाबा के कमरे की ओर दौड़ते आये और देखा की कमरे का व्दार बंद है। और बाबा नींद में जोर जोर से चिल्ला रहे थे उन्होने बाबा को जगाया और पुछा की चोर कहाँ है। कमरे का दुसरा दरवाजा था। उस ओर जाकर देखा तो वह व्दार भी बंद था। उन्होने बाबा से पुछा,"आप चोर-चोर क्यो चिल्ला रहे है?" यह सुन बाबा समझ गये की वे सपने मे थे। अपने यहाँ कोई भी चोर नही आया। इससे पहले वे सपने में ही बडबडाये की, मैने अपने दाहिने पंजे में चौर को पकड रखा है। वह पंजा कसकर पकडे हुए पेट पर है, वह भागने को छटपटा रहा है, यह देखते हुए उन्हे घर के लोगों की आवाजें आयी, और वे उठ बैठे, उन्होने कमरे के चारों ओर देखा।

            उन्होने घर के लोगों को वहाँ खडे पाया। इसके अलावा उन्हें कुछ भी नही दिखा। वे (बाबा) उन्हें बताने लगे की मेरे शरीर से बहुत से वानर भिडे हुए थे। मैं जिधर करवट बदलता उधर वे मेरे शरीर से दब जाते थे। उनमें से एक वानर जो प्रमुख लगता था वह मेरी पेट पर बैठा था। वे सब मेरे शरीर से खेलकर भागने की तैयारी में थे इसलिऐ मैंने उस मुख्य वानर का एक पैर दाहिने पंजे में कसकर पकडा वह भागने की बहत कोशिश कर रहा था। मुझे ऐसा लगा की यही बाबा हनुमानजी है और वह मुझे छोडकर जा रहे है। इसके अतिरिक्त उन्होने कुछ नही बताया और उन्हें अपने कमरे में वापस जाने को कहा. सभी लोग अपने-अपने कमरें में जाने के बाद बाबा आराम से सो गये।

        दुसरे दिन बाबाने घर के सभी लोगों को इकठ्ठा बुलाया और उन्हें रात में घटित घटनाचक्र के बारे में सविस्तर बताना प्रारंभ किया।

           कल रात खाना खाने के बाद हवनकार्य देर से शुरु किया। नित्य का निश्चित समय टल गया था। इससे बाबा हनुमानजी नाराज हुए थे। उन्होने मुझे सपने में दर्शन दिया। वे अपने व्दार पर आकर वही खडे रहे। तब मैं मेरे कमरें में सोया था। वे बोले. "मैं तेरे व्दार पर खडा हूँ। और तू खाना खा रहा है।" इतना कहकर वे वानर सेना लेकर मेरे शरीर से भिडे और उस वानरसेना के साथ मेरे शरीर से खेलकर वे चलते बने । तब मैंने बाबा हुनुमानजी के पैर पकडे और क्षमा मांगी। वह जाने की जल्दी कर रहे थे लेकीन मैने उन्हें छोड़ा नही इस पर मैंने पूरा सोच-विचार किया तो मुझे ऐसा लगता है की, परमेश्वर सही समयपर दौडकर आता है। हमारा निर्धारित समय यह उसका ही समय होता है। इसलिए समस्त कार्य समय पर करें। आज जो परिस्थिती उजागर हुई उससे परमेश्वरी कृपा से बहुत दूर जाना पड सकता था। मैंने उन्हें क्षमा मांगी और परमेश्वर को पास रखा है। तथापि आप सब इससे आगे इसका ध्यान रखें ऐसा परिवार जनों को उन्होने उपदेश किया।

           इससे यह सिध्द होता है की समय का कितना महत्व हैं। हम हमेशा देखते है की बाबा अपने सभी कार्य समयपर करते है और समयसीमा का पूर्ण रुपसे पालन करते है, आओ हम भी इससे समय सीमा में बंधन का व्रत लें।

नमस्कार..!

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नमस्कार..!

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Saturday, May 2, 2020

प्रकरण क्रमांक:- (४) "भूतबाधाओं का विनाश"

   

             "मानवधर्म परिचय"

"मानवधर्म परिचय पुस्तक" ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती से है।

परमपूज्य परमात्मा एक सेवक मंडळ वर्धमान नगर, नागपूर

                      
                          प्रकरण क्रमांक (४)

         "भूतबाधाओं का विनाश"

                   

प्रकरण क्रमांक: (४) "भूतबाधाओं का विनाश"

      
           बाबाने परमेश्वर की कृपा प्राप्त करने के बाद वे उनके पास आनेवाले दःखी त्रस्त लोगों का दुख दूर कर उनको उससे मुक्त करते थे। वर्तमान में भूतबाधाओं के संबंध में जो अंधश्रध्दा लोगों में फैली है। वही अंधश्रध्दा उस समय भी परंपरा के अनुसार लोगो के दिलों में घर कर गयी थी। लोगों का भूतबाधाओं से मुक्ती पाने हेतु दैवी शक्ती के पास जाकर उस त्रासदी से स्वयं को बचाने का प्रयास करते है इस प्रकार बाबाके घर में भूतबाधाओं पर विश्वास करनेवाले लोग थे और उन्हें भी इस परमेश्वरी कृपा लाभ होकर उनकी भूत बाधाएँ खत्म हुई और वे अंधश्रध्दा से आझाद हुए।

          बाबांके घर के सामने उनके दो जेष्ठ बंधु श्री. बाळकृष्ण और नारायणराव अलग रहते है। उनके घर बाळकृष्ण की पत्नी श्रीमती सीताबाई के तन में भूत आता था घर में सभी को इससे सारी रात परेशानी होती थी। बाबा के घर हवनकार्य होने के कारण उन्हे सुख शांति का लाभ हुआ था। बाबाने परमेश्वरी कृपा प्राप्त की थी इसलिए वे दोनो भाई बाबा के पास त्रिताल हवन की समाप्ती के दूसरे ही दिन पधारे और उन्होने बाबा को बिनती की, की बाबा आप हमारे घर हवन करे। इससे हमारे दुःख दूर होंगे। बाबाने उनकी बिनती को मानकर बताया की, मैं हरदिन शाम को एक ही समय ग्यारह दिन हवन करुंगा।

            निर्धारानुसार बाबाने हवन कार्य की शुरुवात की। श्रीमती सीताबाई यहाँ पास ही बैठती थी। हवन के पहले ही दिन हवन कार्य के दौरान उस बाई के शरीर में बहुत सारे भूत आने लगे। आहुती डालने के दौरान उस बाई के मुख से ऐसे शब्द निकलते थे की मैं फलाना हूँ। मैरा नाम फलाना है। मैं फलानी जगह रहती हूँ। मुझे बाबा हनुमानजी ने पकडा और हवनमें डाला। ऐसे शब्द निरंतर हवन समाप्त होने तक हर रोज उस बाई के मुख से निकलते थे। तिसरे हवन के दिन उपरोक्त शब्द करीब-करीब दो घंटो तक उस बाई के मुख से निकलते रहे, तत्पश्चात दूसरे शब्द उसके मुख से बाहर निकले। मेरे शरीर में बहुत जलन हो रही है, मैं जल रही हूँ और अब मर रही हूँ। ऐसे वह जोर-जोर से चिल्लाती थी। उसके यह शब्द सुनकर और उसकी दर्दशा देखकर बाबा को बहुत बुरा लगा। उनसे रहा नही गया उन्होने कपूर जलाकर बाबा हनुमानजी को बिनती की, की बाबा हनुमानजी मेरे सामने यह बहुत बडी समस्या खडी हुई है। तब आप उसे समाधान दे। बिनती पूर्ण होने पर तथा कपूर बुझने के बाद परमेश्वरने बाबा की बिनती को प्रतिसाद दिया। उस बाई के मुख से पुनः शब्द निकले की मैं पार्वती हूँ। बाबा हनुमानजी मुझे कैलास बुलाने आये और कहने लगे की उस औरत के शरीर की अंगार हो रही है। तुम वहाँ जाओं और उसे संभालो। पार्वतीजीने आगे कहा की मेरी अंगार हो रही है मुझे इक्कीस गुंड पानी से नहलाओं और सफेद वस्त्र पहनाओं बाबाकों यह सुनकर आश्यर्च हुआ। उन्हे लगा उसके बोलने में ऐसा परिवर्तन कैसा हुआ। तब बाबाने स्लेटपट्टी पर लिखकर उस परिवार जनों को उस औरत से पुछने के लिए कहा की अब तक शैतान आये अब पार्वती कैसी आयी। उसके अनुसार उस भाई ने पुछा तब उसने उत्तर दिया की हनुमानजी मुझे कैलास बुलाने आये और मुझसे कहा, उस झाड (बाई) के शरीर में प्रवेश करो और उसे बचाओं। यह सुनकर बाबानें स्लेटपट्टी पर लिखकर आदेश दिया की उसे इक्कीस गुंड पानी से नहलाकर सफेद वस्त्र पहनाओं और बाद में हवन कार्य में लाओं। तद्नुसार उस बाई को इक्कीस घगरी पानी से नहलाकर सफेद वस्त्र पहनाए और वह बाई फिर से हवन कार्य में आ बैठी. तब तक हवन करना रोका गया था। तत्पश्चात हवन कार्य पुरा किया। उस दिन से उस बाई के शरीर में भूत आना बिल्कुल बंद हुआ और तब से उसके शरीर में प्रत्येक शनिवार को पार्वती आने लगी।

            इस ग्यारह दिन के हवन कार्य के दौरान एक दिन जिस व्यक्ती ने बाबा को मंत्र दिया था वह व्यक्ती हवन करते समय बाबा के पास आया और हवन करते समय बाबा के पास आया और हवन के लिए बैठा। हवन समाप्त होने पर वह व्यक्ती बाबा कों बताने लगा की मैं जिस जगह पर बैठा था वह जगह हवन कार्य के समय जोर जोर से हिल रही थी। संपूर्ण आहुती देना बंद होने पर जगह हिलना बंद हुआ। इस पर से बाबाने ऐसा अनुमान लगाया की इस घर से संपूर्ण भूतबाधा नष्ट होकर वह पवित्र हुआं है। अब यहाँ परमेश्वर वास्तव करेगा। इस प्रकार उस परिवार के सभी को सुखशांति मिली। 

             बाबा के कारण भूतबाधाएँ नष्ट होती है। यह जब लोगों कों मालून होने लगा। तब बहुत से लोग बाबा के यहाँ आने लगे। बाबा उन्हे मंत्र से तीर्थ बनाकर देते थे। तथा उनके दुःख दूर करते थे। हर शनिचर को जब श्रीमती सीताबाई के शरीर में पार्वती आती थी। तब उनकी ओर भूतबाधाओं से पिडीत लोग आते थे। जिन लोगों के शरीर में देवी, देवता, भूत, शैतान आते थे। वे उस पार्वती से बहुत बहस करते रहते थे तब अंत में पार्वती उनसे कहती की, "मैं तुझे जला दुंगी' " तब वे लोग शांत होते थे और उनके शरीर की देवी, देवता, भूत, शैतान नष्ट होकर वे होश में आते थे। तत्पश्चात उनके शरीर में कभी भी भूत नहीं आता।

          इस प्रकार उनके यहाँ दुःखों से ग्रस्त लोगों को भी सुख मिलने लगा और परमेश्वरी कृपा का लाभ होने लगा और इस तरह बाबानें परमेश्वरी कृपा से भूतबाधाए नष्ट होती है, भूत-शैतान परमेश्वर से डरते है और जहाँ परमेश्वर निवास करता है वहां भूत-शैतान नही रह सकते यह सिध्द कर दिखाया है। भूत बाधा देव-देवता इनपर लगा में व्याप्त अंधश्रध्दा को बाबाने तिलांजली दी। यद्यापि बाबा लोगों के दुःख दूर करते थे फिर भी उन्हें इस बाबत कुछ भी ज्ञात नही था। वे अज्ञातवास में थे।


लिखने में कुछ गलती हुई हो तो में  "भगवान बाबा हनुमानजी"और "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" से क्षमा मांगता हूं।

नमस्कार..!

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🔶 उपर लिखीत पोस्ट "मानवधर्म परिचय" पुस्तक ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती से है।

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