Saturday, November 21, 2020

"बाबा हनुमानजी" पूर्व मुखीच का ? ही माहिती नक्की वाचन करा.

       "बाबा हनुमानजी"पूर्व मुखीच का?

हि माहिती सर्वांनी नक्की वाचन करावे.



               " बाबा हनुमानजी" पुर्व मुखीच का?

    

      इस मार्ग के सेवक हवन करते समय बाबा हनुमानजी की प्रतिमा पुर्व मुखी रखते है तथा हवन करनेवाले का मुख पश्चिम की और होता है। सुर्य पुर्व से उदयमान होने से पुर्व दिशा हमेशा प्रकाशमय होती है। परमेश्वर प्रकाशमय है। पश्चिम की ओर सुर्य अस्त होने के कारण अंधकार होता है, इसी प्रकार मानव आपसे जीवन में किसी कारणों से डुबता है और उसका जीवन अंधकारमय बनता है दुःखी मानव का जीवन नही डुबे उसके जीवन में अंधकारमय वातावरण के बदले प्रकाशमय वातावरण निर्माण होना चाहिये। इस दृष्टिकोन से ,उसका लक्ष्य हमेशा सामने रखी प्रतिमा की ओर याने भगवंत की ओर रहना चाहिये तथा भगवान की ओर देखने से उसके मन में एकाग्रता तैयार होकर एक लक्ष्य, एक चित्त, एक भगवान मानने से उसका जीवन प्रकाशमय बन सकता है।

      

   मानवने मानव जैसा व्यवहार करना चाहिये यही वास्तवमे इस धर्म का उद्देश है। मानव का जीवन त्यागमय होकर दया, क्षमा, शांती आदि गुण उसमें निर्माण कर सत्य, मर्यादा, प्रेम का आचरण उसने सभी के साथ करना चाहिये। यही इस धर्म की शिक्षा है और यह सच्चा मानवधर्म है। इस मार्ग का सेवक यह प्रकरण सात में बताये अनुसार महानत्यागी बाबा को जिन-जिन देवी-देवताओं ने दर्शन दिये। उनसे कम नही तथापि वह श्रेष्ठ ही है यह सिध्द किया है। वे समस्त देवी-देवताएँ भी मानव थे परमेश्वर नही थे ऐसा बाबांने बताया है।

नमस्कार..!


लिखने में कुछ गलती हुई हो तो में  "भगवान बाबा हनुमानजी"और "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" से क्षमा मांगता हूं।


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🔸 ऊपर लिखित आवरण "मानवधर्म परिचय" पुस्तक ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती से है।


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Thursday, November 12, 2020

१५ नोव्हेंबर "वार्षिक जनरल हवनकार्य" ( निमित्त विशेष लेख )

            

      १५ नोव्हेंबर "वार्षिक जनरल हवनकार्य"

                   ..निमित्त विशेष लेख..



        १५ नोव्हेंबर "वार्षिक जनरल हवनकार्य" 

                    ..निमित्त विशेष लेख..


         महानत्यागी बाबा जुमदेवजी को मिला हुआ सन्यासी के मंत्र व्दारा ४२ दिन की साधना कर उन्होने भगवान बाबा हनुमानजी की कृपा प्राप्त की। बाबा के यहाँ आनेवाले दुःखी  मानव को मंत्र व्दारा फुक मारकर बाबा उनके दुख पुरी तरह दुर नही होता था। इसलिए बाबाने हनुमानजी को मार्गदर्शन करने की बिनती की। उसपर मार्गदर्शन करते हुए हनुमानजी ने बाबा को बताया की, सृष्टी रचयता एक परमेश्वर की कृपा प्राप्त करना होगा। इसके लिए हर दिन शाम को एक इस तरह पांच दिन हवन करना होगा।


           हनुमानजी ने किये मार्गदर्शन नुसार बाबाने हवन करना शुरु किया वह दिन रक्षाबंधन के बाद का दिन था। पाचवे दिन हवन समाप्त होते बराबर बाबा निराकार अवस्था में आये और देहभान खो बैठे। इस तरह उन्हे विदेह स्थिती प्राप्त हुई थी। बाबा की यह स्थिती देखकर परिवार के लोग चिंताग्रस्त हुये छटवे दिन परिवार के लोगोने हवन करके कार्य की समाप्ती की। उस समय बाबा के मुखकमलोसे चार वचन निकले। यही चार वचन निकले। यही चार वचन याने परमेश्वर प्राप्ती के चार तत्व है। दुसरे दिन परिवार के लोगो ने बाबा को बिनती की, "'हे भगवान आप सेवक को इस विदेह स्थिती से मुक्त करो, सेवक की खुद की गृहस्थी है। बच्चा है। " उस वक्त भगवान ने बाबा के मुखकमलों से जवाब दिया की, "अगर आपका भाई आपको इतना प्यारा था, आपको उससे इतनी हमदर्दी थी तो आपने उसे भगवान की सेवा करने क्यों लगाई, उस समय आपने उसे रोकना था। अब सेवक भगवान का हो गया, न की किसी का रहा और भगवान सेवक का हो गया है। मेरा सर सेवक का धड और सेवक का सर मेरा धड ऐसा विलीन हो गया है। इस तरह दोनो की आत्मा एक हो गई है। " कुछ देर बाद भगवान ने बाबा के मुखकमल से फिरसे परिवार के लोगों को संबोधित शब्द निकले की, "सेवक भगवान बन गया। इसलिए सेवक एक ही समय थोडासा साधा भोजन करेंगे। जिसमें दाल, चावल, सब्जी और घी होगा। और कोई महिला घर की हो या बाहर की, उसकी छाँव सेवक पर ना पड़े। नही तो सेवक कही का नही रहेगा। जिंदा नही रहेगा।" इस प्रकार भगवान ने सेवक को दैवी शक्ती की जागृती दी।


           बाबा की यह विदेह स्थिती देखकर चिंताग्रस्त हुये परिवार के लोगों को एक दिन बाबा ने मार्गदर्शन करते हुये कहाँ की, "परिवार वाले सुनो, आप सब लोग तीन माह तक भगवान से बिनती करो की हमारे भाई की यह अवस्था समाप्त कर उन्हे गृहस्थी में रखो। भगवान को दया आयेगी तो बाबा गहस्थी में रहेंगे।" बाबाने किये मार्गदर्शन नुसार परिवार के लोगों ने हर रोज सबेरे सुरज निकलने के पहले बिनती करने के कार्य शुरु किये। लगभग तीन माह बाबा विदेह स्थिती में थे। बाबा की विदेह स्थिती पुरी तरह समाप्त होकर पुरा होश मे आये। वह दिन १५ नवंबर १९४८ का था।


          सन्यासी के मंत्र व्दारा परमेश्वरी कार्य करना याने सन्यासी होकर ही परमेश्वरी कृपा प्राप्त कर सकते है। उसी तरह जिन्होने कृपा प्राप्त की वह व्यक्ती मंत्र व्दारा फुक मारकर बाकी लोगों का दूःख दूर कर सकता है। गृहरस्थी में रहने वाला व्यक्ती ऐसे मंत्रोसे भगवत कृपा प्राप्त नही कर सकता। लेकीन महानत्यागी बाबा जुमदेवजी ने सन्यासी के मंत्रोच्दारा प्राप्त की हुयी परमेश्वरी कृपा अपने त्यागसे और निष्काम कर्मयोग से गृहस्थी में रहने वाले दुखी, पिडीत लोगो के कल्याण के लिए काम आकर उन्हें सुख और समाधान मिला दिया है। अगर बाबा विदेह स्थितीसे बाहर नही आते तो गृहस्थी में रहने वाले मानव को इस कृपा का लाभ नही मिलता। इसलिए बाबा की विदेह स्थिती समाप्त होकर वे होश में आये, इसलिये याद रहे करके हर साल १५ नवबंर को मंडल के मानव मंदिर में जनरल हवन कार्यक्रम का आयोजन होता है। इसमे सहभाग होनेवाले सेवक अपने-अपने खाने के डिब्बे लेकर आते है। और हवन कार्य समाप्ती के बाद, भगवत कार्य की चर्चा बैठक होने के उपरान्त सभी सेवक सहभोजन का आनंद लेते है। तद्पश्चात सेवकों के मनोरंजन के लिए सांस्कृतीक कार्यक्रम का आयोजन रहता है। इस जनरल हवन कार्य में भी लाखों सेवक महिला पुरुष अपने-अपने डिब्बे के साथ हाजीर रहकर इस भगवत कार्य का लाभ उठाते है।


लिखने में कुछ गलती हुई हो तो में  "भगवान बाबा हनुमानजी"और "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" से क्षमा मांगता हूं।


नमस्कार...!


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🔸 ऊपर लिखित लेख "मानवधर्म परिचय" पुस्तक ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती से है।

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Tuesday, November 10, 2020

"परमात्मा एक मानवधर्मात" दिवाळी सण कशाप्रकारे साजरी करावी.

                 "मानवधर्म" व "दिवाळी"

परमात्मा एक मानवधर्मातील सेवकांनी दिवाळी सण कशाप्रकारे साजरी करावी.



 "परमात्मा एक" मानवधर्मात दिवाळी सण कशाप्रकारे साजरी करावी.

                     यावर विशेष माहिती


.               "मानवधर्म" व "दिवाळी"


परमात्मा एक मानवधर्मात दिवाळी सण कशाप्रकारे साजरी करावा यावर विशेष माहिती
         
             भारतीय संस्कृतीत दिवाळी हा सण सर्वात मोठा सण म्हणून साजरा करण्यात येतो. दीपावली किंवा दिवाळी म्हणजे "दिव्याचा उत्सव" हा एक प्राचीन हिंदू उत्सव आहे. दिवाळी हा भारतातील सर्वात मोठा आणि उज्वल उत्सव आहे. दिवाळी हा हिंदू धर्माचा मुख्य सण आहे. दिवाळी, दिव्यानंचा सण म्हणून साजरा केला जातो. दिवाळीला "दीपावली" म्हणूनही ओळखले  जाते.अंधार दूर करुन प्रकाशाचे अस्तित्व निर्माण करणारा दीप मांगल्याचे प्रतीक मानला जातो. याच्या प्रकाशाने आपल्या जीवनातील अंधकार दूर व्हावा म्हणून हा दीपोत्सव साजरा केला जातो. या दिवसांत सायंकाळी दारात रांगोळ्या काढून पणत्या लावतात, घरांच्या दारात आकाशदिवे लावले जातात. पावसाळा संपून नवीन पिके हाती आल्यानंतर हा सण साधारणपणे ऑक्टोबर - नोव्हेंबर महिन्याच्या दरम्यान येत असतो. या सणाला भारतात बहुतांश ठिकाणी सुटी असते.

           दिवाळी हा अनेकांतील सर्वात मोठा सण आहे. परंतु, मानव धर्मानुसार आपल्याला दिवाळीचे काहीच महत्व नाही. म्हणजेच आपल्या मानव धर्मात "दिवाळी" या सणाला काहीच महत्व नाही. मानव धर्मातील आपल्या सेवकांसाठी "षष्टीचे हवन" हा सर्वात मोठा सण म्हणून साजरा केला जातो. कारण, राखीनंतर सहाव्या दिवशी "षष्टी" येत असते आणि महान त्यागी बाबा जुमदेवजींच्या आदेशानुसार आपण सर्व सेवक घरोघरी हवन घडवत असतो आणि एका परमेश्वराच्या प्राप्तीचा दिवस म्हणून प्रत्येक वर्षी "षष्टी" चा दिवस आपणास अतिशय महत्वाचा असतो. मानवधर्मातील सेवकांकरीता प्रत्येक दिवस हा दिवाळी सारखा आहे. कारण ४ तत्व, ३ शब्द आणि ५ नियमाने चालणारा सेवक हा नेहमी आनंदी असतो त्यामुळे त्या सेवकांच्या घरी नेहमीच दिवाळी असते. आपल्याला समाजात राहताना सामाजिक बांधिलकी जपावी लागते. त्यासाठी आपली इच्छा असेल तर आपणही आपल्या पध्दतीने दिवाळी साजरी करू शकतो. 

          आपण सर्व सेवक "षष्टी हवनाच्या"  आधीच घरची साफ-सफाई करुन रंग रंगोटी केलेली असतेच त्यामुळे, आपल्याला दिवाळीत जास्त साफ-सफाई करण्याची गरज नसतेच. आपण सेवक घरासमोर रांगोळी काढू शकतो.  बरेच सेवक इच्छेनुसार दिवाळीच्या दिवशी किंवा दिवाळीच्या दिवसात हवन घडवितात. आपल्याला हवन करायला कुठलेही बंधन नाही कारण, आपण हवन स्वइच्छेनुसार केंव्हाही करू शकतो परंतु, दिवाळीत अनेक जण पूजा अर्चना करत असतात म्हणून बरेच सेवक स्वईच्छेने कुठलीही भावना मनात न आणता घरी हवन घडवितात. आणि घराचे वातावरण प्रफुल्लित करतात. त्यादिवशी आपल्या परिसरातील सेवकांना हवणाला बोलावू शकतो. आपण सेवक अनेकांच्या घरी जाऊन फराळ घेत असतो. आपल्या सोयीनुसार जस जमेल तसे फराळ बनवून सेवकांना आमंत्रण देऊ शकतो. आपण सेवक सुंदर अंगनात रांगोळी काढून त्याचा आजूबाजूला दिवे लावू शकतो परंतु, त्यांची पूजा करू नये. भाऊबीजेला बहीण हि भावाला ओवाळू शकते. शक्यतो कमीत कमी ध्वनी, वायू प्रदूषण होईल इतकेच फटाके फोडावे. एक हर्षोल्हासाचा भाग म्हणून दिवाळी साजरी करावी.

           दिवाळी जशी जवळजवळ येतात तर अनेकात आप आपल्या घरी लाईटिंग लावतात. तर आपण सुद्धा लावू शकतो. ज्या वेळी आपल्या घरी "षष्ठीचे हवनकार्य" राहते त्या आधी आपण घरची आपल्या घराची साफसफाई करून पेन्टींग करून लाईटिंग लाऊन सजावट करतो. कारण आपल्या मानवधर्म मार्गातील सर्वात मोठा सण आहे. अनेकात दिवाळीला आपल्या घरी दिवे आकाश कंदील लावून प्रकाश करतात. बाबांनी तर आपल्या जिवनातच प्रकाश केला आहे.  कारण आपण अनेकात असतांना अंधारात होतो. आणि आपले दुःख सुद्धा दुर झाले नव्हते. पण ज्या वेळी मार्गात प्रवेश केला आपले दुःख दुर झाले. बाबांनी अंधारातून प्रकाशाकडे जाण्याचा मार्ग दाखविला. आणि आपले जिवन प्रकाशमय झाले. बाबांनी अशी २४ तास चैतन्य मय शक्ती आपल्याला दिली आहे. त्या शक्तीचा रोज अनुभव घेतो. शब्दरूपी परमेश्वरी कृपा आपल्या कडे आहे आणि बाबांनी सांगितल्या प्रमाणे सकाळी ०५ :३० ला भगवंताची ज्योत लावतो. आणि त्या ज्योती मध्ये परमेश्वर योग देऊन आपले कार्य सफल करतो. म्हणून आपण सेवक रोज प्रकाशमय आहो. आणि बाबांनी अंधारातून प्रकाशात आणले. त्या प्रकाशमय शक्तीचा अनुभव घेत असतो. आणि आपले कर्म तत्व, शब्द व नियमाचा आधारित करत असतो. आपण भगवंताला वचन दिले आहे. "भगवान बाबा हनुमानजी मी जिवनात केलेली सर्व जुनी पूजा, जुने विचार बंद केले.  मी मरीन  किंवा जगीन जीवनात एकच भगवान बाबा हनुमानजीलाच मानीन. असे मी सत्य वचन देतो. याला जिवनात कधीही विसरणार नाही". असे वचन दिले. त्या प्रमाने  आपण तत्व, शब्द व नियमाचे पालन करून आपले जिवन जगत असतो. कुठल्याही देवी देवतांची पूजा करू नये कारण, आपण कुठलेही जुने विचार बाळगू शकत नाही. पर्यावरणपूरक दिवाळी साजरी करण्यावर सर्व सेवकांनी भर दिला पाहिजे आणि आपले बाबांचे आदेश आणि तत्व, शब्द आणि नियमांचा आधारावर चालावे. आपल्या करिता रोज दिवाळी आहे. कारण या मार्गातला सेवक अंधारातून प्रकाशात आलेला आहे.

      
नमस्कार...!

परमात्मा एक सेवक

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Friday, November 6, 2020

"परमात्मा एक" स्टेट्स १५ नोव्हेंबर वार्षिक जनरल हवनकार्य निमित्त परमात्मा एक सॉन्ग

 

Parmatma Ek WhatsApp Status


  ( १५ नोव्हेंबर वार्षिक जनरल हवनकार्य निमित्त सॉन्ग )

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Tuesday, November 3, 2020

"मानवधर्म नियमावली पुस्तक" :- "मानवधर्माची शिकवण"

          "मानवधर्म नियमावली पुस्तक"

               "मानवधर्माची शिकवण"



                        "मानव धर्माची शिकवण"

            !! भगवान बाबा हनुमानजी को प्रणाम !!          
          !! महानत्यागी बाबा जुमदेवजी को प्रणाम !!
                          !! परमात्मा एक !!


            भगवंताच्या प्राप्तीसाठी ज्या कुटुंबाला ही तत्त्वे स्वीकारायची असतील त्या कुटुंबातील सर्व व्यक्तींनी मानव धर्माचे संस्थापक "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" यांनी दिलेल्या तत्व, शब्द, नियमांचे पालन करावे. ज्या कुटुंबाच्या व्यक्तींना तत्व, शब्ब, 'नियम मान्य नसतील त्यांनी या मार्गावर येऊ नये. आल्यास दुःखीच राहावे लागेल. जर कुटुंबात सुख समाधान राहावे अशी इच्छा असेल तर ४ तत्त्व, ३ शब्द आणि ५ नियमांचे परिपूर्ण पालन करावे लागेल.
           

         एका वर्षाचे ३६५ दिवस असतात. वर्ष बदलले म्हणजे तिच पूजा करावी लागते. म्हणून या मार्गात जिवनात केलेली सर्व पूजा बंद करावी लागते आणि अंतःकरणापासून एकच परमेश्वर "भगवान बाबा हनुमानजी" लाच मानावे लागते. या सर्व गोष्टी समजूनच मार्गावर यावे, न समजल्यास पुन्हा विचारुन, समजून घ्यावे. इतके न समजणाऱ्यांनी मार्गावर येऊ नये.

          

         या मार्गावर येणाऱ्या मानवाच्या कुटूंबात दुःख आहे म्हणून तात्पुरत्या सुखाकरिता खोटे-नाटे बोलून स्वार्थ-साधूपणा करु नये. केल्यास दुःख भोगावे लागते. कारण बाबा जुमदेवजीची निष्काम सेवा आहे. त्यात फरक पडतो.
                                   

                        मानवधर्माचे संस्थापक

              "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी"

नमस्कार..!

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वरिल माहिती "मानवधर्म नियमावली पुस्तक" ( मराठी ) सुधारित सहावी आवृत्ती मधील आहे.

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Friday, October 30, 2020

परमात्मा एक मानवधर्मात कोजागिरी कशाप्रकारे साजरी करतात


     "परमात्मा एक" मानवधर्मात कोजागिरी  

                कशाप्रकारे साजरी करतात.


          "परमात्मा एक" मानवधर्मात कोजागिरी  

                    कशाप्रकारे साजरी करतात.


          कोजागरी पौर्णिमा किंवा शरद पौर्णिमा, ही आश्विन पौर्णिमेला हा भारतीय धर्म संस्कृतीतील महत्वाचा दिवस मानला जातो. ही पौर्णिमा शरद ऋतूतील आश्विन महिन्यात येते. इंग्रजी दिनदर्शिकेनुसार कोजागरी पौर्णिमा बहुधा सप्टेंबर ते ऑक्टोबर या दरम्यान असते. कृषी संस्कृतीत ह्या दिवसाला विशेष महत्त्व आहे. 
        

        खगोलशास्त्रदृष्ट्या या दिवशी चंद्र पृथ्वीच्या सर्वात जवळ असतो. आश्विन महिन्यात मध्यरात्रीला असणाऱ्या पौर्णिमेलाच कोजागरी पौर्णिमा म्हणतात. तशी पौर्णिमा आली नाही तर दुसऱ्या दिवशीच्या पौर्णिमेला कोजागरी पौर्णिमा समजले जाते. या दिवशी दूध आटवून त्यात केशर, पिस्ते, बदाम, चारोळी, वेलदोडे, जायफळ, साखर वगैरे गोष्टी घालून, दुधात मध्यरात्री पूर्ण चंद्राची किरणे पडू देतात आणि मग ते दूध प्राशन केले जाते. 
        

            कोजागिरी पौर्णिमा हा सण अनेकातील लोक फार मोठया उत्साहाने साजरा करतात. कोजागिरी पौर्णिमा म्हणजे शरद पौर्णिमा. अनेकातील लोक या दिवशी पूजा , दान करतात. अनेका मध्ये दुध आटवत चंद्राची किरण पडल्यानंतर रात्रीला दवबिंदू पडतो. त्याला चंद्र देवाने सोडलेले अमृत समजल्या जाते. परंतु आपल्या मानवधर्मा मध्ये चंद्र किरणांची किंवा अमृत रुपी पडलेला दवबिंदू याच काहीच महत्त्व नाही. असो हा आपला विषय नाही. मानवधर्मात कोजागिरी कशाप्रकारे साजरी करावी यावर बोलुयात.
      

          परमात्मा एक मानवधर्मात पूजापाठ  , जुने विचार मनात न बाळगता एकच परमेश्वर मानुन तत्व, शब्द व नियमाचे पालन करतात. आपण ह्या सणाला आपल्या मानवधर्मानुसार साजरा करत असतो. सेवक त्या दिवशी सेवकांना एकत्र बोलावून चर्चा बैठक घेत असते. ह्या दिवशी सर्व सेवक-सेविका एकत्र येतात. आपापले अनुभव सांगतात.
       

              मी काही जेष्ठ सेवकांकडुन ऐकले आहे की या दिवशी अनेकातील लोक कोजागिरी निमित्ताने सर्व एकत्रीत येऊन कोजागिरी कार्यक्रम करतात. तर काही सेवकांनी बाबांजवळ कोजागिरी करण्याची इच्छा व्यक्त केली होती. त्यावर एका सेवकाने म्हटले की माझ्या घरी गाई म्हशी आहेत आणि माझ्या दुधाचा व्यवसाय आहे तर माझ्या घरी चर्चा बैठक घेऊन सर्व सेवक एकत्रीत येऊन कोजागिरी कार्यक्रम करूया तेव्हा बाबांनी त्यांच्या शब्द ऐकून चर्चा बैठकीचा माध्यमातून सेवक एकत्रीत येऊन कोजागिरी कार्यक्रम करू शकता आणि बाबांनी सहमति दिली असावी. तेव्हापासून गटात, गावोगावी, परिसरातील मार्गदर्शक सेवकांचा सहकार्याने कोजागिरी करतात.
  
            त्याच प्रमाने प्रत्येक वर्षी कोजागिरी या दिवशी परमपूज्य परमात्मा एक सेवक मंडळ वर्धमान नगर, नागपूर च्या अंतर्गत व सर्व सेवकांचा सहकार्याने ( मानव मंदिर ) सांस्कृतिक भवनात चर्चा बैठकीचा माध्यमातून कोजागिरी कार्यक्रम आयोजित करण्यात येते. त्यानंतर गटागटात, गावोगावी, परिसरात मार्गदर्शक सेवकांचा सहकार्याने कोजागिरी करण्यात येते. बाबांनी दिलेल्या चार तत्व, तीन शब्द व पाच नियमाचा आधारावर चर्चा सत्र घेण्यात येते. सेवकांचे अनुभव, मार्गदर्शकांचे बाबांचा शिकवणी प्रमाणे मार्गदर्शन केले जातात सर्व सेवक, सेविका, बालगोपाल या कोजागिरी निमित्ताने एकत्रित येतात आणि कोजागिरी कार्यक्रम साजरा करतात. 
   
              या कार्यक्रमात येणारे सेवक कोजागिरी कार्यक्रमाला जास्त महत्त्व न देता चर्चा बैठकीला महत्व देऊन कार्यक्रम करतात. बाबांचा आदेशानुसार तत्व, शब्द व नियमाचे पालन करून कार्यक्रम व्यवस्थित पार पाडतात .

कोजागिरी पौर्णिमा तुमच्या आयुष्यात 
सौख्य, मांगल्य, समृद्धी आणि दीर्घायुष्य 
घेऊन येणारी ठरो! हीच आमची कामना 

कोजागिरी च्या निमित्ताने मिळाली बासुंदीची मेजवानी 
चर्चा बैठकीच्या माध्यमातून मिळाली मानवधर्माची माहिती

मंद प्रकाश चंद्राचा 
त्यात गोड स्वाद दुधाचा 
विश्वास वाढू द्या नात्याचा 
त्यात असूद्या गोडवा साखरेचा 
आपण व आपल्या परिवारास 
माझ्यातर्फे गोड गोड शुभेच्छा

नमस्कार...

माझ्या लिहिण्यात काही चुक भुल झाली असेल तर, मी "भगवान बाबा हनुमानजी" व "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" यांना श्रमा मागतो. 

🙏🏻परमात्मा एक सेवक🙏🏻

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Tuesday, October 20, 2020

"मानवधर्म परिचय पुस्तक" :- "प्रस्तावना"

                "मानवधर्म परिचय पुस्तक"

                            "प्रस्तावना"




                            !! "प्रस्तावना" !!
     
           परमेश्वराने आकाश, पाताळ, वायू, अग्नी व  पाणी या पंच तत्वावर आधारित सृष्टी निर्माण करताना पृथ्वीची रचना केली. या पृथ्वीवर अनेक जीवजंतू, प्राणी आणि वनस्पती यांची निर्मिती केली. मानव हा प्राणी असून परमेश्वराने त्याला ओळखण्याकरिता बुद्धी दिली. जेणेकरून तो आपल्या बुद्धीचा वापर करून परमेश्वराला ओळखील त्याचबरोबर मोह, माया, अहंकार हे गुणही त्याच्यात निर्माण केले. मानव घडविताना परमेश्र्वरी  हेतू हाच होता की , तो आपल्या बुद्धीचा उपयोग करून मोह, माया व आकार यांना बाजूला ठेवून (विसरून) त्याचे लक्ष परमेश्वराकडे राहील व परमेश्वरी कृपा संपादन करून आपले मानवी जीवन सुखी करील.


           पृथ्वीच्या रचनेप्रमाणे आणि निरनिराळ्या वातावरणामुळे मानवाने पृथ्वीचे अनेक खंड निर्माण केले आहेत आणि या प्रत्येक खंडात अनेक राष्ट्र निर्माण झालेत. मानवाला परमेश्वराबद्दल जागविण्याकरिता अनेक महापुरुषांनी जन्म घेतला. ही सृष्टी सदोदित सत्य मानवाची राहावी म्हणून परमेश्वराने कालचक्र निर्माण केले. या कालचक्रात सत्ययुग, द्वापार युग, त्रेतायुग आणि कलियुग अशी चार युगांची रचना केली.

          सत्ययुगात सर्व देव जन्माला आलेत अशी म्हण आहे त्याप्रमाणे जे जे महापुरुष जन्माला आलेत त्यांनी परमेश्वराची आराधना करने परमेश्वरी सिद्धी प्राप्त केली आणि सिद्धीनुरूप त्यांनी आपआपल्या परीने धर्म निर्माण केलेत उदाहरणार्थ - हिंदू, इस्लाम, खिचन, बौद्ध, सनातन धर्म इत्यादी. आणि त्यांनी परमेश्वराला अगणित नावे दिलीत. जसे अल्ला, भगवान, येशू खिस्त, बुद्ध इत्यादी प्रत्येक धर्मात परमेश्वर हा एकच आहे असे सांगितले आहे हे इतिहासावरून आपण पाहतो, पण परमेश्वराची अगणित नावे असल्यामुळे मानव गोंधळतो व तो या सर्व नावानुरूप अगणित परमेश्वर आहे असे म्हणतो. हिंदुधर्मात तर छत्तीस कोटी देवदेवता आहेत असे म्हटले जाते परमेश्वर निराकार आहे. सत्य, नीती आणि आत्याच्या दृष्टीने अवलंबिलेली धर्मनीती हीच
परमेश्वर - प्राप्तीचे खरे गुण आहेत.

            पुढे कालांतराने मानवाने, महापुरुषांनी परमेश्वराची ओळख करून दिल्याप्रमाणे त्याची मूर्ती तयार केली. हिंदूंनी देवळे, मुसलमानानी मरिजद, ख्रिश्चनांनी गिरिजाघर आणि बुद्धांनी बुद्ध विहार बांधलेत आणि त्या ठिकाणी या मूर्तीची स्थापना करून तिला देव मानून 'मूर्तिपूजा' करावयास सुरुवात केली. परंतु हे महापुरुष परमेश्वर नव्हते तर त्याचे अनुयायी होते. त्यांनी मानवाला परमेश्वराबद्दल जागविण्याचे कार्य केले. मानव बुद्धिजीवी असून सुद्धा खरा परमेश्वर कोण व कुठे आहे हे तो ओळखू शकला नाही.

             धर्म निर्माण झाल्यावर काही देश 'धर्मवादी' देश म्हणून उदयास आलेत. त्यांतील काही एकधर्मी, काही बहुधर्मी तर काही 'धर्मनिरपेक्ष' देश म्हणूनही संबोधण्यात येतात. यांतील 'भारत' हा धर्मनिरपेक्ष देश मानला जातो.कारण या देशात निरनिराळ्या धर्माचे लोक राहतात. धर्माधर्मातील लोकांत रूढी, चालीरीती, अंधश्रद्धा आणि प्रत्येकाला त्याच्या धर्माबद्दल वाटणारा अभिमान यामुळे आपआपसात भाडण होऊ नये आणि देश एकसंघ राहावा हा त्यामागील मूळ हेतू होय. तसा भारत हा देश हिंदू' चा देश आहे.

            जसजसे युगपरिवर्तन होत गेले, तसतशी मानवाची वृत्ती बदलत गेली. आणि यातील काही लोकांनी सर्व धर्मात आपणच परमेश्वराचे खरे भक्त आहोत, खरे रक्षक आहोत, या भावनेने त्यांनी मूर्तिपूजा करून पूजाअर्चा सुरू केली. मानवाला जीवन कंठताना
बऱ्याच गोष्टींची मोठ्या प्रमाणात आवश्यकता भासू लागली म्हणून त्यांनी मानवाला जे कार्य जमेल त्याप्रमाणे त्यांनी काम करावे, उदाहरणार्थ, अन्न हवे म्हणून शेती करणे, वस्त्र हवे म्हणून कपडे तयार करणे, राहावयास घर तयार करणे इत्यादी अनेक प्रकारची कामे मानवांनी करायला सुरुवात केली. त्याप्रमाणे त्यांच्या कामधंद्यांवरून जाती निर्माण झाल्या आणि कामाच्या स्वरूपावरून त्यांनी जातींमध्ये उच्चनीचता असा भेदभाव सुरू केला. जे लोक परमेश्वराची पूजा करण्याचे कार्य करीत होते ते सर्वोत्तम मानू लागले. अशा रीतीने तो 'उच्चभ्रू समाज मानला गेला.

         परमेश्वराची खरी आराधना करणारे लोक दूर राहिले. परंतु परमेश्वराला प्राप्त करण्याच्या नावाखाली स्वतःला बुद्धिमान, परमेश्वराचे एक अंग म्हणून म्हणवून घेणारे संधिसाधू, ढोंगी असे काही लोक निर्माण झालेत व ते इतरांचा छळ करू लागले. त्यांनी मंत्र, तंत्र या विद्या हस्तगत करून लोकांच्या पिळवणुकीला सुरुवात केली. याप्रकारे संपूर्ण जगातील सर्व धर्मात अंधश्रद्धा निर्माण करण्यात आली. यामध्ये हिंदू हे अग्रेसर आहेत. अशा प्रकारे मानवाची सर्व दुःखे दूर करण्याचे अधिकार आम्हासच असून आम्हीच दुःख दूर करू शकतो असा गैरसमज इतर मानवांत निर्माण केल्या गेला.

            या सर्व युगांत जेव्हा जेव्हा अराजकता, अनीती, अनैतिकता, असत्य, दुराचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार, स्वार्थीपणा, मोह, अहंकार या वृत्ती मानवांत भयंकर प्रमाणात वाढू लागल्या तेव्हा तेव्हा परमेश्वराने या गोष्टींचा नायनाट करण्याकरिता मानवाच्या रूपात जन्म घेतला आणि त्या गोष्टींबद्दल मानवांत जागृती निर्माण करून त्यांचा नाश केला. इतकेच नव्हे तर मानवाला परमेश्वरी गुणांबद्दल जागविले. आणि मानवाला मोक्ष कसा मिळेल याबद्दल त्यांनी शिकवण दिली.थोडक्यात आध्यात्मिक शक्ती नीती,सत्य,आल्याच्या दृष्टीने अवलंबिलेली धर्मनीती हीच खरी ‘परमेश्वरी कृपा' आहे हे शिकविण्याचे कार्य या महापुरुषांकडून घडविले. अशा प्रकारे प्रत्येक युगात कालपरत्वे सत्य, नीती टिकविण्यासाठी ‘परमेश्वराचा अंश' म्हणून महापुरुषांच्या रूपात परमेश्वराचा जन्म झालेला आहे.

              सध्या तीन युगे संपलेली असून चौथे युग म्हणजे कलियुग सुरू आहे. या युगाचा उत्तरार्ध सुरू आहे असे समजल्या जाते. या कलियुगात संपूर्ण जगात खूप मोठ्या प्रमाणात असत्य, अमर्यादा, अनैतिकता, भ्रष्टाचार, अत्याचार, अहंकार वाढत आहे. स्वार्थापायी
जन्मदात्या आईवडिलांची, पोटच्या गोळ्याची पिळवणूक होत आहे. गरज पडल्यास त्याची हत्या करण्यास न कचरणारे लोकही आहेत. धर्माच्या नावावर अनेक खोटे व्यवहार करणारे साधुसंत निर्माण झाले आहेत. ते तंत्र, मंत्र, मूर्तिपूजेला प्राधान्य देत आहेत. अंधश्रद्धा निर्माण करून गोरगरीब , दुःखीकष्टी जनतेला लुबाडणे सुरू आहे. मानवा मध्ये अहंकार निर्माण झाला आहे.

         भारत हा 'धर्मनिरपेक्ष' देश असला तरी या देशात धर्माच्या नावावर लोकांची पिळवणूक सुरू आहे . येथे मुख्यत्वेकरून हिंदुधर्माचे लोक जास्त राहतात. हिंदुधर्मात सुद्धा कामधंद्यावरून माणसांचे चार भेद निर्माण केले आहेत. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आणि शूद्र हे ते चतुर्भेद आहेत. यात सुद्धा अनेक जाती निर्माण झालेल्या आहेत. या जातींमध्ये अनेक सत्पुरुष, संत, सद्गुरू निर्माण झाले आहेत आणि धर्माच्या नावावर परमेश्वराबद्दल जागृती निर्माण करण्याचे कार्य ते करीत आहेत. परंतु ते खऱ्या अर्थाने परमेश्वरी ओळख करून देत नाहीत असे म्हटल्यास वावगे ठरू नये. कारण त्यांनी चालीरीतीप्रमाणे तंत्र, मंत्र, मूर्तिपूजा याच रूढी ठेवलेल्या आहेत आणि परमेश्वर यांतच आहे, असे ते सांगत असतात. अशा प्रकारे ते अंधश्रद्धेला खतपाणी घालत आहेत. यामुळे सत्याचा लोप होत असून मानवांत परमेश्वरी कृपेची खरी जागृती होताना दिसत नाही.

         मानव हा आपल्या बुद्धीचा वापर करून त्याच्यावर येणाऱ्या संकटांवर मात करण्याचा प्रयत्न करतो. बदलणाऱ्या वातावरणाचा परिणाम होऊन त्याला अनेक शारीरिक दुःख निर्माण होतात आणि ती दुःखे उपचाराने लवकर बरी झाली नाहीत तर तो मानसिक व आर्थिक दुःखाने पीडित होतो. सर्व प्रकारचे उपचार करूनही त्याला समाधान मिळत नाही तेव्हा तो निराश होतो. अशा वेळेस त्याला परमेश्वराची आठवण होते व तो परमेश्वराच्या प्राप्तीसाठी भटकत असतो. अशा वेळेस त्याचा गैरफायदा संधिसाधू लोक धर्माच्या नावावर घेतात. परंतु दुःख दूर करीत नाहीत अशा परिस्थितीत देशात किंबहुना जगात शांती निर्माण करण्याकरिता ‘सत्याचे रोप' परत लावावे असे परमेश्वराला वाटले
असावे. जेणेकरून मानवजागृती होऊन कालचक्राप्रमाणे कलियुगातून जग पुन्हा सत्ययुगात सत्य, नीतिमत्तेला धरून प्रवेश करील आणि म्हणून सत्य, नीती प्रस्थापित करण्याकरिता सत्यवादी, प्रेमळ, मोह, माया, अहंकारापासून अलिप्त राहणारी, परमेश्वराची खरी ओळख करून देणारी व्यक्ती, जिचा कर्तृत्वाने आणि मार्गदर्शनाने मानवांत परमेश्वराबद्दल जागृती निर्माण होईल आणि पुन्हा सत्ययुग निर्माण होईल, अशा एका निष्काम कार्य करणाऱ्या कर्मयोगी महापुरुषाची परमेश्वराने निर्मिती केली आहे. ती व्यक्ती मनुष्याला सत्य,मर्यादा, प्रेमाचे आचरण करण्याबद्दल निष्काम भावनेने सदोदित मार्गदर्शन करते. आणि एका परमेश्वराची निराकार आणि चैतन्यात ओळख करून देते. इतकेच नव्हे तर नुसत्या आपल्या मार्गदर्शनाने मानवांची अनेक दुःखे मग ती शारीरिक, मानसिक वा आर्थिक असो नष्ट करते. त्यांना रोगमुक्त करते. ते परमेश्वराची ओळख करून देताना सांगतात की, परमेश्वर हा 'एकच' आहे व तो प्रत्येकात विराजमान आहे. तो निराकार आहे. ती व्यक्ती नसून जागृत शक्ती आहे आणि ती मानवात चोवीस तास चैतन्य आहे. ती निर्जीव वस्तूंमध्ये नसून सजीव प्राण्यांच्या आत्यात आहे. परमेश्वर दिसत नसून त्याचे गुण दिसतात. म्हणून मूर्तिपूजा हे शुद्ध ढोंग आहे. मानवाने परमेश्वराला प्रिय असणारे सत्य, मर्यादा, प्रेमाचे आचरण करावे. त्यागाने कार्य घडवावे म्हणजे खरा मोक्ष मिळतो. मानवाने मानवासारखे वागावे ही शिकवण ते देत असतात. म्हणून त्यांनी 'मानवधर्म' स्थापन केला,
ज्याला जात-पात नाही. असे जे महापुरुष आहेत ते "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी".

लिहिण्यात काही चुक भुल झाली असेल तर मी"भगवान बाबा हनुमानजी" व "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" यांना श्रमा मागतो.

नमस्कार...!

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वरिल माहिती "मानवधर्म परिचय पुस्तक" ( मराठी ) सुधारित पाचवी आवृत्ती मधील आहे.

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परमपूज्य परमात्मा एक सेवक मंडळ वर्धमान नगर, नागपूर


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परमात्मा एक मानवधर्मात सेवकांनी दसरा सण कशाप्रकारे साजरा करावा.

  "परमात्मा एक" मानवधर्मात सेवकांनी दसरा सण कशाप्रकारे साजरा करावा.         !! भगवान बाबा हनुमानजी को प्रणाम !!       !! महानत्याग...