Sunday, December 27, 2020

"परमेश्वरी कृपाप्राप्ती" का "साक्षात्कार एंव प्रचिती" सभी सेवक-सेविका अवश्य पढे।

"परमेश्वरी कृपाप्राप्ती" का "साक्षात्कार एंव प्रचिती"


सभी सेवक-सेविका अवश्य पढे। और अपने परिचित सेवकों में शेअर करें।




.                 "परमेश्वरी कृपाप्राप्ती"      

                 "साक्षात्कार एवं प्रचिती"


           त्रिताल हवन के पहले ही दिन जब दुसरा हवन कार्य चालु था निश्चित किये अनुसार बाबाके अनुज मारोतराव सोये थे। वह गहरी नींद में सोये हुये  ही जोर-जोरसे चिल्ला रहे थे लंगोटी वाले बाबा की जय। यह शब्द जब बाबाके कानों पर पडे तब बाबाने एक कागजपर लिखकर घर के लोगों को उन्हे पुछताछ करने को कहा की ऐसा तू क्यों चिल्लाया? तब बाबा के बड़े भाई श्री. जागोबाजी ने उन्हें नींद से जगाया और वे उठ बैठने पर उनसे पुछा की तुने लंगोटीवाले बाबा की जय ऐसा क्यों कहा ? तब उन्होने सभी को बताया की, बाबा हनुमानजी सिरपर चांदी का ताज (मुकुट) पहने, दाहिने हाथ में चांदी की गदा लेकर घर के चारों ओर घुम रहे है। ऐसा दृश्य सपने में देखा। बाद में उन्होने बाबा को यह हकीकत बतायी दूसरा हवन समाप्त होने पर बाबाने विचार किया की परमेश्वर अब हमारी सुरक्षा करने हेतु तत्पर है।

             इस त्रिताल हवन में श्री. जागोबाजी जगह की साफ सफाई करना। रंगोली रचना इत्यादि काम करते थे। तो हम सबकी आई (माता) सौ. वाराणसीबाई प्रसाद तैयार करती थी, इस प्रकार सात दिन त्रिताल हवन कर सातवे दिन सभीने भोजन करके उत्सव मनाया और बाबाने परमेश्वर की कृपा प्राप्त की।

             इस परमेश्वरी कृपा का लाभ वे अन्य लोगो को भी कर देते थे। उनके यहाँ जो कोई दुःखी, परेशान लोग आते थे उनके दुःख मंत्र से तीर्थ बनाकर तथा मंत्रोच्चार से फुंक मारकर दूर करने लगे।

नमस्कार...!

लिखने में कुछ गलती हुई हो तो में "भगवान बाबा हनुमानजी" और "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" को श्रमा मांगता हूं।

( टिप:- यह पोस्ट कोई भी कॉपी न करें। बल्की ज़्यादा से ज़्यादा शेअर करे। )

ऊपर लिखित आवरण "मानवधर्म परिचय पुस्तक" ( हिंदी ) सुधारित द्वितीय आवृत्ती से है।

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Sunday, December 20, 2020

"परमेश्वरी कृपाप्राप्ती" की "पहिली परिक्षा और प्रतिसाद"

 "परमेश्वरी कृपाप्राप्ती" की "पहिली परिक्षा और प्रतिसाद"

हि माहिती नक्की वाचन करा व आपल्या परिचित सेवकांपर्यंत शेअर करावे.


                   "परमेश्वरी कृपाप्राप्ती"

             "पहिली परिक्षा और प्रतिसाद"




           विधी के इक्कीसवे दिन दोपहर में बाबा घर में थे, उस समय उनके जेष्ठ बंधु श्री. नारायणराव उनके यहाँ आये और वह बताने लगे की " मेरी लड़की की तबियत बहुत खराब है। कुछ समझ में नहीं आता फिर भी तू मेरे साथ चल उसे देख और उसे हो रहे कष्टों से कैसे भी मुक्त कर।" तब बाबाने उन्हे बताया, "भैया मुझे कुछ भी नही
समझता। मैं केवल भोर में बाबा हनुमानजी को कपूर लगाकर मंत्र पढता हूँ" इतना कहकर बाबा उसके साथ उसके घर गये वे बाबा के मकान के सामने ही रहते थे ।
          

        बाबाने उस लडकी को देखा तब उसे देखकर उन्हे बहुत दुःख हुआ। उस लडकी के संपुर्ण शरीर में बड़े बडे फोडे हुए थे। और वे फुटकर उससे संपुर्ण शरीर में खुन बह रहा था। संपूर्ण शरीर में लाल चिटियाँ लगी थी। उस लडकी के शरीर का छोटा सा हिस्सा भी खाली नही दिख रहा था। वह चिटियों से पूरा घेरा हुआ था। यह देखकर बाबा बहुत घबराये। वे चिंताग्रस्त हुए उनके मन में विचार आया की बाबा हनुमानजी को प्रसन्न करने हेतु विधी करना बहुतही मुश्किल है, ऐसी जो मान्यता है वह सच होगी। अब परमेश्वर हमें यह विधी पुर्ण करने नही देगा। विधी तो पूरी करना ही है, अन्यथा क्या कष्ट आयेगा, कहना कठीण है। एक तरफ खाई है तो दुसरी और कुआँ इस कहावत के अनुसार बाबा के समक्ष हालात निर्माण हुए थे, फिर भी बाबा का निर्धार मजबुत था वे नही डगमगाएँ। बाबा वहाँ कुछ भी न बोले और ना ही कोई उपचार किये बगैर घर वापस आये।
   

          दुसरे दिन यानि विधी के बाईसवे दिन, नियत समयानुसार बाबा विधी करने मंदिर गये। वहाँ उन्होने बाबा हनुमानजी की मुर्ती का हमेशा की तरह स्नान कराया, कपूर एवं अगरबत्ती लगायी और बिनती की कि हे बाबा हनुमानजी आपने मुझ पर बहुत बडी विपत्ती लाकर रखी है, मै आपसे बिनती करता हूँ की मुझे पहले अपने चरणों में विलिन करें अन्यथा उस लडकी को मुक्त करें। तत्पश्चात इक्कीस प्रदक्षिणा लगाकर घर आये बाबा के मन में उस दिन कोई भी विचार नही आया था उनका वह दिन ऐसे ही बिता।
   

      तेईसवे दिन बाबा सुबह-सवेरे (भोर) विधी निपटाकर घर आकर बाहर के कमरे में दरवाजे के पास ही बैठे थे। जिस लडकी को कष्ट था, वही लडकी उनके घर के आंगन में खेल रही थी। बाबा का ध्यान उस लड़की की ओर गया। उसे देखकर बाबा विस्मित हुए उस लडकी के सारे फोडे ठीक हए थे, यह देखकर बाबा को खुशी हुई। इस प्रकार परमेश्वरने बाबा की प्रथम परिक्षा ली और बाबा का परमेश्वर के प्रति रहनेवाला अत्याधिक प्रेम और श्रध्दा देखकर उनकी बिनती को परमेश्वर ने प्रतिसाद दिया। बाबा को पहिली सफलता मिली, परमेश्वर की कृपा प्राप्त करने के बाबा के प्रयत्न साकार होने की शुरुवात हुई। इस प्रकार बाबाने इकतालिस दिन का विधी पूर्ण किया तथा बयालिसवे दिन बाबानें परमेश्वर को शक्कर का भोग (नैवेद्य) लगाकर उसकी समाप्ति की। प्रसाद सबकों बांटा वह दिन रविवार ६ जनवरी १९४६ होकर बाजार का दिन था। इस समय बाबा सिर्फ २५ वर्ष के थे। इससे बाबा का एक और गुण ध्यान में आता है की परमेश्वर के विषय में उनके मन में अथाह आत्मियता और लगन थी।
    

       बाबांने विधी समाप्त करने के बाद उसी दिन वे जिस व्यक्ती ने उन्हें मंत्र दिया था। उसके पास गये, उसने बाबां का मेहमान के नाते आदरतिथ्य किया। कुछ देर बैठने के बाद बाबांने उनसे कहा की इकतालिस दिन का विधी काल पूर्ण हुआ। और आज बयालिसवे दिन उस विधी की समाप्ति की। विधी सरलता से पूरा हुआ ऐसा कहकर बाबाने अगला कार्य बताने हेतु उन्हें विनती की।
     

       अगले कार्य के बाबत बताते हुए उस व्यक्ती ने बाबा से कहा की, हररोज एक बार इस प्रकार ७,११,२१,३१,४१,५१,६१,७१,८१, ९१ और १०१ दिन उसी मंत्र से १०८ बार मंत्र कहकर उतनी ही बार हवन में घी और हवनपुडा इसकी आहुती डालनी पड़ती है। लेकीन वह संन्यासी त्रिताल (एक रात में तीन बार) हवन करता था। उसका विधी ऐसा की हवन सुर्योदय पूर्व समाप्त होने चाहिए। जगह साफ करना, स्नान करना, हवन की रचना कर १०८ बार मंत्रोच्चार करके आहुती डालना। पहला हवन समाप्त होते ही दूसरा हवन शुरु करने के पूर्व वही जगह साफ कर, स्नान कर, उसी जगह पर फिर से हवन की रचना करनी होगी। पुनः प्रसाद करना और हवन का विधी पूर्ण करनी होगी वह समाप्त होते ही तिसरा हवन उसी जगह पर वह जगह साफ कर एवं स्नान कर फिर से प्रसाद बनाके और हवन पूर्ण करना होगा। इस प्रकार तीन हवन एक ही रात में पूरा करना होता है। यह त्रिताल हवन ११,२१ से १०१ दिन करना पडता है।
      

        हवन के लिए आवश्यक सामान याने रानगोवरी (खेत/वन में पाये जाने वाले सुखे गोबर के टुकडे) पिंपल, बरगद, संत्रा, मोसंबी, आम, उंबर, आदि पेड़ों में से पाँच पेडो की लकडियाँ, नरियल, फल, पान, सुपारी, हार, बेल, फुल, आहुती डालने हेतु घी (परिस्थिती को देखते हुए असली या वनस्पती) दही, दुध, केले, बाबा हनुमानजी की प्रतिमा वाला फोटो, गोमुत्र, चंदन चुरा, हवनपुडा, अबीर, सेंदुर, गुलाल इत्यादी सामान लगता है और प्रसाद के रूप में हलवा (कढई) करना पडता है।
          यह सब लिखकर बाबा शाम को नागपुर वापस आये। तब घर के सभी लोग उनकी राह देख रहे थे। घर आने पर उन्होने उपरोक्त पूरी जानकारी सब को बतायी और कहा की यह खर्च की बात है। पहले ही हमारी आर्थिक परिस्थिती बहुत खराब है। इसलिए हम दिनभर बुनकरी करके शाम को मजदरी मिलने पर सामान की खरेदी कर रात को त्रिताल हवन करेंगे। उसी तरह त्रिताल हवन के कारण रातभर जागरण होगा इसलिए सभीने जागरण करना जरुरी नही क्योंकी सभीने जागरण किया तो दुसरे दिन बुनकाम न होने से, मजदूरी न मिलने से हवन का सामान न ला सकने के कारण हवन कार्य कर नहीं सकेंगे और हवन कार्य खंडीत होगा। इस पर सभी लोगोंने गंभीरतापुर्वक विचार किया और दुसरे दिन से सात दिन त्रिताल हवन करने का निश्चय किया।
     

        निश्चित किये अनुसार दुसरे दिन सभीने बुनकरी कर शाम को मजदुरी मिलने पर बडी मुश्किल से सामान जुटाया और सायं ७ बजे प्रथम हवन की शुरुवात की। इस मार्ग के सेवक जिस प्रकार हवन की रचना करते है। उसी प्रकार उसकी रचना की और बताये अनुसार हवन कार्य प्रारंभ किया। पहला हवन समाप्त होते ही दुसरा, तिसरा हवन करते हुए पूरे सात दिन तक त्रिताल हवन किया। पहला हवन समाप्त होने पर भोजन करने के बाद में दुसरा हवन रात को ग्यारह बजे शुरु करते तिसरा हवन रातको तीन बजे शुरु करके तडके (भोर) पांच बजे समाप्त करते। पुनः द्सरे दिन दिनभर बुनकरी कर श्याम को सामान जुटाते। इस समय बहुत कष्ट होता था बाबा स्वयं हवन करते थे। उसके अलावा स्वयं ही हवन में आहुती डालते। अन्य किसी को भी हवन में आहुती डालने की अनुमती नही थी। हवन करते वक्त बाबा किसी से भी बात नही करते थे। किसी चीज की आवश्यकता पडने पर इशारा करते। जब कुछ पुछना हो तो स्लेटपर कलम से लिखकर या कागजपर पेन से लिखकर पुछते थे। इसप्रकार बाबानें लगातार सात दिन त्रिताल हवन किया।

नमस्कार..!

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Saturday, November 21, 2020

"बाबा हनुमानजी" पूर्व मुखीच का ? ही माहिती नक्की वाचन करा.

       "बाबा हनुमानजी"पूर्व मुखीच का?

हि माहिती सर्वांनी नक्की वाचन करावे.



               " बाबा हनुमानजी" पुर्व मुखीच का?

    

      इस मार्ग के सेवक हवन करते समय बाबा हनुमानजी की प्रतिमा पुर्व मुखी रखते है तथा हवन करनेवाले का मुख पश्चिम की और होता है। सुर्य पुर्व से उदयमान होने से पुर्व दिशा हमेशा प्रकाशमय होती है। परमेश्वर प्रकाशमय है। पश्चिम की ओर सुर्य अस्त होने के कारण अंधकार होता है, इसी प्रकार मानव आपसे जीवन में किसी कारणों से डुबता है और उसका जीवन अंधकारमय बनता है दुःखी मानव का जीवन नही डुबे उसके जीवन में अंधकारमय वातावरण के बदले प्रकाशमय वातावरण निर्माण होना चाहिये। इस दृष्टिकोन से ,उसका लक्ष्य हमेशा सामने रखी प्रतिमा की ओर याने भगवंत की ओर रहना चाहिये तथा भगवान की ओर देखने से उसके मन में एकाग्रता तैयार होकर एक लक्ष्य, एक चित्त, एक भगवान मानने से उसका जीवन प्रकाशमय बन सकता है।

      

   मानवने मानव जैसा व्यवहार करना चाहिये यही वास्तवमे इस धर्म का उद्देश है। मानव का जीवन त्यागमय होकर दया, क्षमा, शांती आदि गुण उसमें निर्माण कर सत्य, मर्यादा, प्रेम का आचरण उसने सभी के साथ करना चाहिये। यही इस धर्म की शिक्षा है और यह सच्चा मानवधर्म है। इस मार्ग का सेवक यह प्रकरण सात में बताये अनुसार महानत्यागी बाबा को जिन-जिन देवी-देवताओं ने दर्शन दिये। उनसे कम नही तथापि वह श्रेष्ठ ही है यह सिध्द किया है। वे समस्त देवी-देवताएँ भी मानव थे परमेश्वर नही थे ऐसा बाबांने बताया है।

नमस्कार..!


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Thursday, November 12, 2020

१५ नोव्हेंबर "वार्षिक जनरल हवनकार्य" ( निमित्त विशेष लेख )

            

      १५ नोव्हेंबर "वार्षिक जनरल हवनकार्य"

                   ..निमित्त विशेष लेख..



        १५ नोव्हेंबर "वार्षिक जनरल हवनकार्य" 

                    ..निमित्त विशेष लेख..


         महानत्यागी बाबा जुमदेवजी को मिला हुआ सन्यासी के मंत्र व्दारा ४२ दिन की साधना कर उन्होने भगवान बाबा हनुमानजी की कृपा प्राप्त की। बाबा के यहाँ आनेवाले दुःखी  मानव को मंत्र व्दारा फुक मारकर बाबा उनके दुख पुरी तरह दुर नही होता था। इसलिए बाबाने हनुमानजी को मार्गदर्शन करने की बिनती की। उसपर मार्गदर्शन करते हुए हनुमानजी ने बाबा को बताया की, सृष्टी रचयता एक परमेश्वर की कृपा प्राप्त करना होगा। इसके लिए हर दिन शाम को एक इस तरह पांच दिन हवन करना होगा।


           हनुमानजी ने किये मार्गदर्शन नुसार बाबाने हवन करना शुरु किया वह दिन रक्षाबंधन के बाद का दिन था। पाचवे दिन हवन समाप्त होते बराबर बाबा निराकार अवस्था में आये और देहभान खो बैठे। इस तरह उन्हे विदेह स्थिती प्राप्त हुई थी। बाबा की यह स्थिती देखकर परिवार के लोग चिंताग्रस्त हुये छटवे दिन परिवार के लोगोने हवन करके कार्य की समाप्ती की। उस समय बाबा के मुखकमलोसे चार वचन निकले। यही चार वचन निकले। यही चार वचन याने परमेश्वर प्राप्ती के चार तत्व है। दुसरे दिन परिवार के लोगो ने बाबा को बिनती की, "'हे भगवान आप सेवक को इस विदेह स्थिती से मुक्त करो, सेवक की खुद की गृहस्थी है। बच्चा है। " उस वक्त भगवान ने बाबा के मुखकमलों से जवाब दिया की, "अगर आपका भाई आपको इतना प्यारा था, आपको उससे इतनी हमदर्दी थी तो आपने उसे भगवान की सेवा करने क्यों लगाई, उस समय आपने उसे रोकना था। अब सेवक भगवान का हो गया, न की किसी का रहा और भगवान सेवक का हो गया है। मेरा सर सेवक का धड और सेवक का सर मेरा धड ऐसा विलीन हो गया है। इस तरह दोनो की आत्मा एक हो गई है। " कुछ देर बाद भगवान ने बाबा के मुखकमल से फिरसे परिवार के लोगों को संबोधित शब्द निकले की, "सेवक भगवान बन गया। इसलिए सेवक एक ही समय थोडासा साधा भोजन करेंगे। जिसमें दाल, चावल, सब्जी और घी होगा। और कोई महिला घर की हो या बाहर की, उसकी छाँव सेवक पर ना पड़े। नही तो सेवक कही का नही रहेगा। जिंदा नही रहेगा।" इस प्रकार भगवान ने सेवक को दैवी शक्ती की जागृती दी।


           बाबा की यह विदेह स्थिती देखकर चिंताग्रस्त हुये परिवार के लोगों को एक दिन बाबा ने मार्गदर्शन करते हुये कहाँ की, "परिवार वाले सुनो, आप सब लोग तीन माह तक भगवान से बिनती करो की हमारे भाई की यह अवस्था समाप्त कर उन्हे गृहस्थी में रखो। भगवान को दया आयेगी तो बाबा गहस्थी में रहेंगे।" बाबाने किये मार्गदर्शन नुसार परिवार के लोगों ने हर रोज सबेरे सुरज निकलने के पहले बिनती करने के कार्य शुरु किये। लगभग तीन माह बाबा विदेह स्थिती में थे। बाबा की विदेह स्थिती पुरी तरह समाप्त होकर पुरा होश मे आये। वह दिन १५ नवंबर १९४८ का था।


          सन्यासी के मंत्र व्दारा परमेश्वरी कार्य करना याने सन्यासी होकर ही परमेश्वरी कृपा प्राप्त कर सकते है। उसी तरह जिन्होने कृपा प्राप्त की वह व्यक्ती मंत्र व्दारा फुक मारकर बाकी लोगों का दूःख दूर कर सकता है। गृहरस्थी में रहने वाला व्यक्ती ऐसे मंत्रोसे भगवत कृपा प्राप्त नही कर सकता। लेकीन महानत्यागी बाबा जुमदेवजी ने सन्यासी के मंत्रोच्दारा प्राप्त की हुयी परमेश्वरी कृपा अपने त्यागसे और निष्काम कर्मयोग से गृहस्थी में रहने वाले दुखी, पिडीत लोगो के कल्याण के लिए काम आकर उन्हें सुख और समाधान मिला दिया है। अगर बाबा विदेह स्थितीसे बाहर नही आते तो गृहस्थी में रहने वाले मानव को इस कृपा का लाभ नही मिलता। इसलिए बाबा की विदेह स्थिती समाप्त होकर वे होश में आये, इसलिये याद रहे करके हर साल १५ नवबंर को मंडल के मानव मंदिर में जनरल हवन कार्यक्रम का आयोजन होता है। इसमे सहभाग होनेवाले सेवक अपने-अपने खाने के डिब्बे लेकर आते है। और हवन कार्य समाप्ती के बाद, भगवत कार्य की चर्चा बैठक होने के उपरान्त सभी सेवक सहभोजन का आनंद लेते है। तद्पश्चात सेवकों के मनोरंजन के लिए सांस्कृतीक कार्यक्रम का आयोजन रहता है। इस जनरल हवन कार्य में भी लाखों सेवक महिला पुरुष अपने-अपने डिब्बे के साथ हाजीर रहकर इस भगवत कार्य का लाभ उठाते है।


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Tuesday, November 10, 2020

"परमात्मा एक मानवधर्मात" दिवाळी सण कशाप्रकारे साजरी करावी.

                 "मानवधर्म" व "दिवाळी"

परमात्मा एक मानवधर्मातील सेवकांनी दिवाळी सण कशाप्रकारे साजरी करावी.



 "परमात्मा एक" मानवधर्मात दिवाळी सण कशाप्रकारे साजरी करावी.

                     यावर विशेष माहिती


.               "मानवधर्म" व "दिवाळी"


परमात्मा एक मानवधर्मात दिवाळी सण कशाप्रकारे साजरी करावा यावर विशेष माहिती
         
             भारतीय संस्कृतीत दिवाळी हा सण सर्वात मोठा सण म्हणून साजरा करण्यात येतो. दीपावली किंवा दिवाळी म्हणजे "दिव्याचा उत्सव" हा एक प्राचीन हिंदू उत्सव आहे. दिवाळी हा भारतातील सर्वात मोठा आणि उज्वल उत्सव आहे. दिवाळी हा हिंदू धर्माचा मुख्य सण आहे. दिवाळी, दिव्यानंचा सण म्हणून साजरा केला जातो. दिवाळीला "दीपावली" म्हणूनही ओळखले  जाते.अंधार दूर करुन प्रकाशाचे अस्तित्व निर्माण करणारा दीप मांगल्याचे प्रतीक मानला जातो. याच्या प्रकाशाने आपल्या जीवनातील अंधकार दूर व्हावा म्हणून हा दीपोत्सव साजरा केला जातो. या दिवसांत सायंकाळी दारात रांगोळ्या काढून पणत्या लावतात, घरांच्या दारात आकाशदिवे लावले जातात. पावसाळा संपून नवीन पिके हाती आल्यानंतर हा सण साधारणपणे ऑक्टोबर - नोव्हेंबर महिन्याच्या दरम्यान येत असतो. या सणाला भारतात बहुतांश ठिकाणी सुटी असते.

           दिवाळी हा अनेकांतील सर्वात मोठा सण आहे. परंतु, मानव धर्मानुसार आपल्याला दिवाळीचे काहीच महत्व नाही. म्हणजेच आपल्या मानव धर्मात "दिवाळी" या सणाला काहीच महत्व नाही. मानव धर्मातील आपल्या सेवकांसाठी "षष्टीचे हवन" हा सर्वात मोठा सण म्हणून साजरा केला जातो. कारण, राखीनंतर सहाव्या दिवशी "षष्टी" येत असते आणि महान त्यागी बाबा जुमदेवजींच्या आदेशानुसार आपण सर्व सेवक घरोघरी हवन घडवत असतो आणि एका परमेश्वराच्या प्राप्तीचा दिवस म्हणून प्रत्येक वर्षी "षष्टी" चा दिवस आपणास अतिशय महत्वाचा असतो. मानवधर्मातील सेवकांकरीता प्रत्येक दिवस हा दिवाळी सारखा आहे. कारण ४ तत्व, ३ शब्द आणि ५ नियमाने चालणारा सेवक हा नेहमी आनंदी असतो त्यामुळे त्या सेवकांच्या घरी नेहमीच दिवाळी असते. आपल्याला समाजात राहताना सामाजिक बांधिलकी जपावी लागते. त्यासाठी आपली इच्छा असेल तर आपणही आपल्या पध्दतीने दिवाळी साजरी करू शकतो. 

          आपण सर्व सेवक "षष्टी हवनाच्या"  आधीच घरची साफ-सफाई करुन रंग रंगोटी केलेली असतेच त्यामुळे, आपल्याला दिवाळीत जास्त साफ-सफाई करण्याची गरज नसतेच. आपण सेवक घरासमोर रांगोळी काढू शकतो.  बरेच सेवक इच्छेनुसार दिवाळीच्या दिवशी किंवा दिवाळीच्या दिवसात हवन घडवितात. आपल्याला हवन करायला कुठलेही बंधन नाही कारण, आपण हवन स्वइच्छेनुसार केंव्हाही करू शकतो परंतु, दिवाळीत अनेक जण पूजा अर्चना करत असतात म्हणून बरेच सेवक स्वईच्छेने कुठलीही भावना मनात न आणता घरी हवन घडवितात. आणि घराचे वातावरण प्रफुल्लित करतात. त्यादिवशी आपल्या परिसरातील सेवकांना हवणाला बोलावू शकतो. आपण सेवक अनेकांच्या घरी जाऊन फराळ घेत असतो. आपल्या सोयीनुसार जस जमेल तसे फराळ बनवून सेवकांना आमंत्रण देऊ शकतो. आपण सेवक सुंदर अंगनात रांगोळी काढून त्याचा आजूबाजूला दिवे लावू शकतो परंतु, त्यांची पूजा करू नये. भाऊबीजेला बहीण हि भावाला ओवाळू शकते. शक्यतो कमीत कमी ध्वनी, वायू प्रदूषण होईल इतकेच फटाके फोडावे. एक हर्षोल्हासाचा भाग म्हणून दिवाळी साजरी करावी.

           दिवाळी जशी जवळजवळ येतात तर अनेकात आप आपल्या घरी लाईटिंग लावतात. तर आपण सुद्धा लावू शकतो. ज्या वेळी आपल्या घरी "षष्ठीचे हवनकार्य" राहते त्या आधी आपण घरची आपल्या घराची साफसफाई करून पेन्टींग करून लाईटिंग लाऊन सजावट करतो. कारण आपल्या मानवधर्म मार्गातील सर्वात मोठा सण आहे. अनेकात दिवाळीला आपल्या घरी दिवे आकाश कंदील लावून प्रकाश करतात. बाबांनी तर आपल्या जिवनातच प्रकाश केला आहे.  कारण आपण अनेकात असतांना अंधारात होतो. आणि आपले दुःख सुद्धा दुर झाले नव्हते. पण ज्या वेळी मार्गात प्रवेश केला आपले दुःख दुर झाले. बाबांनी अंधारातून प्रकाशाकडे जाण्याचा मार्ग दाखविला. आणि आपले जिवन प्रकाशमय झाले. बाबांनी अशी २४ तास चैतन्य मय शक्ती आपल्याला दिली आहे. त्या शक्तीचा रोज अनुभव घेतो. शब्दरूपी परमेश्वरी कृपा आपल्या कडे आहे आणि बाबांनी सांगितल्या प्रमाणे सकाळी ०५ :३० ला भगवंताची ज्योत लावतो. आणि त्या ज्योती मध्ये परमेश्वर योग देऊन आपले कार्य सफल करतो. म्हणून आपण सेवक रोज प्रकाशमय आहो. आणि बाबांनी अंधारातून प्रकाशात आणले. त्या प्रकाशमय शक्तीचा अनुभव घेत असतो. आणि आपले कर्म तत्व, शब्द व नियमाचा आधारित करत असतो. आपण भगवंताला वचन दिले आहे. "भगवान बाबा हनुमानजी मी जिवनात केलेली सर्व जुनी पूजा, जुने विचार बंद केले.  मी मरीन  किंवा जगीन जीवनात एकच भगवान बाबा हनुमानजीलाच मानीन. असे मी सत्य वचन देतो. याला जिवनात कधीही विसरणार नाही". असे वचन दिले. त्या प्रमाने  आपण तत्व, शब्द व नियमाचे पालन करून आपले जिवन जगत असतो. कुठल्याही देवी देवतांची पूजा करू नये कारण, आपण कुठलेही जुने विचार बाळगू शकत नाही. पर्यावरणपूरक दिवाळी साजरी करण्यावर सर्व सेवकांनी भर दिला पाहिजे आणि आपले बाबांचे आदेश आणि तत्व, शब्द आणि नियमांचा आधारावर चालावे. आपल्या करिता रोज दिवाळी आहे. कारण या मार्गातला सेवक अंधारातून प्रकाशात आलेला आहे.

      
नमस्कार...!

परमात्मा एक सेवक

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Friday, November 6, 2020

"परमात्मा एक" स्टेट्स १५ नोव्हेंबर वार्षिक जनरल हवनकार्य निमित्त परमात्मा एक सॉन्ग

 

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Tuesday, November 3, 2020

"मानवधर्म नियमावली पुस्तक" :- "मानवधर्माची शिकवण"

          "मानवधर्म नियमावली पुस्तक"

               "मानवधर्माची शिकवण"



                        "मानव धर्माची शिकवण"

            !! भगवान बाबा हनुमानजी को प्रणाम !!          
          !! महानत्यागी बाबा जुमदेवजी को प्रणाम !!
                          !! परमात्मा एक !!


            भगवंताच्या प्राप्तीसाठी ज्या कुटुंबाला ही तत्त्वे स्वीकारायची असतील त्या कुटुंबातील सर्व व्यक्तींनी मानव धर्माचे संस्थापक "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" यांनी दिलेल्या तत्व, शब्द, नियमांचे पालन करावे. ज्या कुटुंबाच्या व्यक्तींना तत्व, शब्ब, 'नियम मान्य नसतील त्यांनी या मार्गावर येऊ नये. आल्यास दुःखीच राहावे लागेल. जर कुटुंबात सुख समाधान राहावे अशी इच्छा असेल तर ४ तत्त्व, ३ शब्द आणि ५ नियमांचे परिपूर्ण पालन करावे लागेल.
           

         एका वर्षाचे ३६५ दिवस असतात. वर्ष बदलले म्हणजे तिच पूजा करावी लागते. म्हणून या मार्गात जिवनात केलेली सर्व पूजा बंद करावी लागते आणि अंतःकरणापासून एकच परमेश्वर "भगवान बाबा हनुमानजी" लाच मानावे लागते. या सर्व गोष्टी समजूनच मार्गावर यावे, न समजल्यास पुन्हा विचारुन, समजून घ्यावे. इतके न समजणाऱ्यांनी मार्गावर येऊ नये.

          

         या मार्गावर येणाऱ्या मानवाच्या कुटूंबात दुःख आहे म्हणून तात्पुरत्या सुखाकरिता खोटे-नाटे बोलून स्वार्थ-साधूपणा करु नये. केल्यास दुःख भोगावे लागते. कारण बाबा जुमदेवजीची निष्काम सेवा आहे. त्यात फरक पडतो.
                                   

                        मानवधर्माचे संस्थापक

              "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी"

नमस्कार..!

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वरिल माहिती "मानवधर्म नियमावली पुस्तक" ( मराठी ) सुधारित सहावी आवृत्ती मधील आहे.

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परमपूज्य परमात्मा एक सेवक मंडळ वर्धमान नगर, नागपूर

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परमात्मा एक मानवधर्मात सेवकांनी दसरा सण कशाप्रकारे साजरा करावा.

  "परमात्मा एक" मानवधर्मात सेवकांनी दसरा सण कशाप्रकारे साजरा करावा.         !! भगवान बाबा हनुमानजी को प्रणाम !!       !! महानत्याग...